मंगलवार, 5 अप्रैल 2022

36 साल बाद मित्र से मिलना

आप कल्पना करें कि जब आपका कोई मित्र 36 साल के बाद मिले तो आप कैसा महसूस करेंगे। ऐसा ही कुछ हुआ इस बार की बनारस यात्रा में संजय श्रीवास्तव से मिलकर । संजय यद्यपि मेरे मित्र तो नहीं है मेरे छोटे भाई मित्र है लेकिन उनसे मित्रता वैसे ही है जैसे कोई एक मित्र होता है ।विश्वविद्यालय जीवन के दौरान समकक्ष होने के कारण हम लोग काफी घनिष्ठता  थी और शैतानियों की बात ही न पूछिए। जब मैं बनारस आया तो संजय ने फोन कर मिलने की इच्छा जाहिर की और बीती रात अपने घर पर खाने पर निमंत्रित किया। मित्र का आग्रह हो तो टाला कैसे जा सकता है ।हम लोग शाम संजय के घर पहुंचे और कई घंटे बिताए।  मित्रता 80 के दशक की है।यह  वह दौर था जब पेन फ्रेंड्स का दौर पूरे विश्व देश तेजी  में चल रहा था। बातों बातों में पता चला कि संजय की पत्नी रेनू श्रीवास्तव जी भी उस दौरान मेरी पत्र मित्रता की सूची में थी ।फिर जो बातों का सिलसिला चला तो अंत होने का नाम ही नहीं ले रहा था। देर रात संजय और उनकी पत्नी ने हम लोगों को घर तक छोड़ने भी आए। संजय इन दिनों अध्यापन कार्य से मुक्त होकर एक राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल में बनारस ब्यूरो का काम देख रहे हैं। बधाई संजय भाई। चलते चलते बताता चलूं संजय जी के पिताजी भारतीय रेल सेवा में थे,बात 80 के दशक की है ।श्रीलंका में भारत सरकार के सहयोग से रेल पटरी बिछाई जा रही थी ।जिसका पूरा कार्य उन्हीं की देखरेख में हुआ था ।




कंक्रीट के जंगल में तब्दील होती "मसूरी"

 

     हिमालय की तराई में स्थित देहरादून से लगभग 24 किलोमीटर दूर एवं समुद्र तल से 6500 फीट की ऊंचाई पर बसा है 'मसूरी'। मसूरी जो पूरे साल ठंडा रहने वाला एक पहाड़ी कस्बा। जो अब शहर में तब्दील होने की राह पर है। कहते हैं इस क्षेत्र में कभी बड़े पैमाने पर मन्सूर के पौधे उगते थे , इसीलिए से पहले 'मन्सूरी' और बाद में 'मसूरी' कहा जाने लगा । यह  कस्बा 1823 से पहले एक निर्जन पहाड़ी हुआ करता था ।1827 में 'मसूरी' कस्बे की खोज कैप्टन यंग ने की थी ।जिन्होंने इसकी सुंदरता से प्रभावित होकर यहीं पर बसने का मन बना लिया।

इसी 'मसूरी' शहर में एक समय था जब शहर के माल रोड पर भारतीयों की आवाजाही पर अंग्रेजी हुकूमत ने प्रतिबंध लगा रखा था। जिसके लिए शिलापट्ट  लगा रखे थे। कि जिस पर लिखा था पर इंडियन एवं डालों  का आना अलाउड नहीं है । लेकिन स्वतंत्रता के 75 साल बाद इसी माल रोड पर 'अंग्रेज ऐसे गायब हो गए' "जैसे गधे के सर से सिंग। मजे की बात तो यह है कि अंग्रेज तो नहीं दिखते  लेकिन भारतीय कुत्तों की एक हुजूम देखी जा सकती है ।हां जिसे हम कह सकते हैं कि यह कुत्ते विदेशी नस्ल के कुत्तों की तरह ही है, 'माल रोड' पर । माल रोड पर किधर भी निकल जाएं तो आपको इस इन कुत्तों से सामना करना ही पड़ेगा, लेकिन ये  आपको नुकसान नहीं पहुंचाएंगे।मसूरी के माल रोड की संरचना बिल्कुल नैनीताल के माल रोड की तरह ही है।  जिसका निर्माण ब्रिटिश हुकूमत के अधिकारियों ने कराया था। 

  मसूरी में मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू गर्मियों में ठंड ठंडी बयार लेने आया करते थे। महात्मा गांधी ने दो बार इसी मसूरी शहर की यात्रा की थी। पहली यात्रा उन्होंने 1929 में और दूसरी यात्रा स्वतंत्रता से ठीक एक साल पहले 1946 में । तब महात्मा गांधी ने मसूरी के सौंदर्य को देखकर लिखा था।"यहां आ कर मैं अपने सभी दुख दर्द भूल जाता हूं । सच मसूरी सौंदर्य प्रेमियों के लिए स्वर्ग से कम नहीं है। चलते चलते यह भी बताता चलूं मसूरी मे "हैप्पी वैली" नामक एक जगह है ।जहां पर 1959 में चीन  के अधिकृत तिब्बत से निर्वाचित होने पर दलाई लामा ने यहीं पर अपनी पहली सरकार बनाई थी।लेकिन किन्हीं कारणों से बाद में हिमाचल के कांगडा शहर के धर्मशाला  में स्थापित हो गई ।

 मसूरी में एक जगह है लाल टिब्बा  जहां सी दूरबीन से अगर मौसम साफ रहे तो एवरेस्ट की चोटियां दिखाई देती हैं और साथ ही बद्रीनाथ व केदारनाथ के दर्शन भी हो जाते हैं। पर अब मसूरी बदल रही है।जगह जगह कंक्रीट के जंगल उभर रहे हैं जिसके चलते मसूरी के सौंदर्य में काल के ग्रहण लग रहे हैं। पर्यटक तो बहुत आते हैं, हो सकता है उत्तराखंड पर्यटन विभाग के राजस्व का एक बड़ा भाग यहां से मिलता हो ।लेकिन पर्यटकों के लिए कोई विशेष सुविधाएं न तो पर्यटन विभाग और न ही राज्य सरकार उपलब्ध करवा रही है। देहरादून से मसूरी के लिए राज्य परिवहन निगम की बसें न के बराबर  चल रही है जिसके  कारण टैक्सी वालों की लूटमार मची हुई है। अगर इस ओर  थोड़ा सा ध्यान दिया जाए तो मसूरी आने वाले पर्यटकों की संख्या में और इजाफा हो सकता है ।

जनसंदेश छोड़ी नहीं, निकला गया था


 विश्वमानव से जनसंदेश होने के बाद का सम्पादकीय परिवार 

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       सही बात है देश कि विश्वमानव से जन सन्देश अख़बार होने के बाद कई परिवर्तन भी हुए थे,होना भी स्वाभाविक प्रक्रिया के तहत था भी जरुरी. अख़बार करनाल से गुड़गांव शिफ्ट हो गया .लगभग सभी कर्मचारी भी वहीँ पहुँच गए ,केवल महिला कर्मियों को छोड़ कर .उनकी कई दिक्कते भी थीं. संपादक जी पंजाब वाले और प्रबन्धक जी भी आ गए. अख़बार छापना भी शुरू हो गया ,यह अलग कि बात है की कुछ दिनों तक वही दिल्ली के बहादुर शाह जफ़र मार्ग से एक दैनिक के यहाँ छपता रहा. एक-दो महीने तक स्टाफ को रहने के लिए नव निर्मित यूथ हास्टल उपलब्ध कराया गया ,स्टाफ को कार्यालय (कापस खेडा )तक लाने -ले जाने के लिए देवी लाल जी का चुनावी रथ मुहैय्या करवा दी गई. चुनाव के इतिहास मैं वह पहला रथ था जिसे बस के ढांचे मैं तैयार किया गया था,बटन दबाव,गेट खुल जाते, दूसरा बटन दबाव आटोमेटिक मंच बस के ऊपर निकल जाता . बहुत मज़ा लिया उस रथ का हम सभी स्टाफ ने.

         यह बताना भूल ही गया उन दिनों मैं फीचर देखता था ,जन सन्देश का पहला अंक विधिवत हरियाणा दिवस पर निकलना था ,संपादक जी के साथ चौटाला जी के पास मैं भी पहुंचा. जो भी बातें हुईं,वह अलग की बात. चंडीगढ़ से दिल्ली एक कर देना पड़ा . हरियाणा दिवस पर पहला अंक आया, फुल साइज़ का 70 पेज का .अब आप कल्पना कर लीजिये उन दिनों की यह हालत थी .केंद्र व राज्य सरकार के विज्ञापनों के आलावा उद्योगों आदि के आलग. केवल इतना ही नहीं एक माह तक हर रोज चार पेज का विज्ञापन का पन्ना अलग से अखबार के साथ बंटता रहा. इसी बिच दोपहर का अख़बार भी इसी के नाम से शुरु हो गया ,आठ पेज का टेबलाईड . उसकी विशेषता यह की वह बाज़ार में कम ,लेकिन दोपहर बाद दिल्ली से उड़ने वाले सभी विमानों में यात्रियों को उपलब्ध. यहीं से जन्संदेश की उलटी गिनती शुरू हो गई.

         इसी बीच दो बड़ी न्युक्तियाँ हुईं ,एक चोटाला जी के शायद बहनोई थे उनके अधिकार मैं पू


रा अख़बार ,दूसरी ग्वालियर के एक बड़े (स्वघोषित) पत्रकार कार्यकारी संपादक हो कर आ गए,जब नए संपादक जी आये तो वह भी अपनी टीम भी लेकर आये. यहीं अख़बार के दिन फिरने लगे .इधर प्रधान संपादक जी ने अपने बेटे को मेरी जगह फीचर संपादक बना दिया.मैं वापस समाचार कक्ष में.

          बस इसी दौरान परिवार वालों ने मेरी शादी तय कर दी ,और मैं लम्बी छुट्टी पर घर चला गया. शादी के जब वापस लोटा ,ऑफिस पहुंचा तो जो दरबान नमस्कार बोलता था ,उसने अन्दर जाने से रोक दिया , कारण पूछने पर गेट पर लगे नोटिस को पढने को कहा . सच उस पर निगाह गई तो मैं चकित रह गया ,निकलेजाने वालों में मेरा नाम दूसरे नंबर पर. कारण पता नहीं,संपादक से मिलने की बात की तो दरबान ने बताया जाखड साहब ने किसी को भी अन्दर जाने से मना किया है. किसी तरह सम्पादक जी बहार आये और सारी बातें बताईं ,छुट्टी पर जाने के बाद से कुछ कर्मचारी किसी बात को लेकर हड़ताल कर दी थी ,जिसके कारण सभी 35 पुराने (जो विश्वनव के थे )कर्मचारियों को निकल दिया गया है. इसके बावजूद संसथान ने मेरा पुराना बकाया वेतन का भुगतान बिना किसी हिचक के कर दिया .मज़े की बात यह है की साल भीतर ही जन सन्देश का प्रकाशन बंद हो गया .



रोचक प्रसंगों का उल्लेख जरूरी....

 

  जनसंदेश ,गुरुग्राम का सम्पादकीय परिवार 

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   पत्रकारिता में जवानी के दिनों की एक प्रसंग का उल्लेख करना जरूरी समझता हूँ,जिससे आगे के लोगों को पता चले कि तब और आज की पत्रकारिता में कितनी भिन्नता होती थी. जवानी के दिनों का मतलब ,तब तक शादी नहीं हुई थी.घुमक्कड़ प्रवृति का युवा ,जहाँ चाहो लगा दो ...उफ्फ तक नहीं करेगा.

     बरेली वाले नेता एरन जी के अख़बार विश्वमानव के करनाल संस्करण में कार्यरत था,बात 88-89 की है, हरियाणा के मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला होते थे,उनके सर पर अख़बार निकालने का भूत सवार हो गया ,उन्होंने ने विश्वमानव को खरीद लिया,मतलब अख़बार के साथ अख़बार के कर्मचारी भी ,बिक गए. महीने भीतर अख़बार का नाम बदल कर 'जन सन्देश' हो गया.लेकिन एक बात की तारीफ चौटाला जी की करूँगा कि उन्होंने ने कर्मचारियों के साथ अच्छा व्यवहार ही किया,सभी के वेतनों में योग्यतानुसार वृद्धि भी हुई .प्रबंधन मंडल में बदलाव जरुर हुए ,जो स्वाभाविक भी थे. मैनेजर व संपादक भी बदले,संपादक पंजाब से आये ,और मैनेजर वहीँ पास के किसी शहर के थे.मज़े की बात यह थी कि इन दोनों लोगों को पुत्र मोह बहुत था.जिसके लिए कुछ भी कर सकते थे,किया भी. ख़ैर ...

    वह मामला यह था कि हरियाणा में मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला,केंद्र में  खिचड़ी सरकार,उप प्रधानमंत्री देवी लाल जी, हरियाणा में राजनीतिक उठा पटक. सुबह नए संपादक जी का बुलउवा घर पर आया की कार्यालय बुलाया गया है,जल्दी-जल्दी कार्यालय पहुंचा, संपादक जी ने बताया कि चौटाला जी आज शाम को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे रहे हैं ,यह कार्यक्रम कर्नाटक भवन में शाम चार-पांच बजे होगा,उनका आदेश है कि इस खबर को तुम ही कवर करो, आफिस की जीप ले लो और एक बजे तक निकल जाओ ,जिससे समय तक पहुँच जाओ.यह सुनकर घबराहट बहुत हुई ,कभी दिल्ली में इस तरह के किसी बड़े राजनीतिक कार्यक्रम को कवर नहीं किया था,इस लिए अधिक. आफिस ने निकल कर अपने संचार संपादक जी को यह जानकारी दी,तो उन्हों ने न घबड़ाने की हिदायत दी ,और कुछ टिप्स दिए .वही समाचार संपादक जी आज एक बड़े अख़बार के प्रधान संपादक भी हैं.

  ख़ैर साहब दोपहर बाद आफिस की जीप से निकला दिल्ली के लिए ,दुबला-पतला लगभग सात फुट लम्बा ड्राइवर साथ में. रुकते-रुकते लगभग सवा तीन बजे कर्नाटक भवन पहुंचा.जहाँ पर गहमागहमी चरम सीमा पर. पत्रकारों व फोटोग्राफरों का हुजूम (तब टी वी चैनलों की आमद नहीं थी,एक मात्र दूरदर्शन ही हुआ करता था.) प्रेस कांफ्रेंस में उप प्रधानमंत्री देवी लाला जी को भी आना था,सुरक्षा के चाक-चौबंद व्यवस्था.दिल्ली के पत्रकारों को सभी जानते ही रहे होंगे,उनमें दुबला-पतला ,दाड़ी वाला एक युवक मैं . तभी अचानक मेरे पास सादे वर्दी में दो सुरक्षा कर्मी आये और एक किनारे ले जाकर बातचीत करने लगे,पहले तो मैं घबराया,क्योंकि मेरे पास कार्यालय का कोई परिचय पत्र नहीं था,लेकिन उन्ही लोगों ने जब मेरा,मेरे पिता जी का नाम  ,कहाँ से शिक्षा प्राप्त की ,कहाँ -कहाँ नौकरी की आदि-आदि बताया तो मैं अचंभित हो उठा.बाद मैं पता चला की उप प्रधानमंत्री के घर ,एवं चौटाला जी के घर अक्सर आना जाना मेरा रहता था,वह भी अख़बार के काम से ,इसलिए गुप्तचर विभाग ने मेरे बारे में मेरी जन्मभूमि फैजाबाद ,कर्मभूमि बनारस जा कर सारी जानकारी जुटाई थी. प्रेस कांफ्रेंस हुई ,चौटाला जी ने इस्तीफे की घोषणा की . उसके बाद धीरे से चौटाला जी को प्रणाम कर (पत्रकारिता के दृष्टिकोण से यह गलत है,लेकिन आखिर वह मेरे अन्नदाता जो ठहरे.)करनाल के लिए वापस. दूसरे दिन दिल्ली व आस-पास के सभी अख़बारों की  'लीड स्टोरी' थी.

कहने का मतलब पत्रकारिता के क्षेत्र में आप की पहचान आप के संस्थान के साथ-साथ आप के व्यवहार व काम से होती है,न कि परिचय-पत्र से.

चलते-चलते बताता चलूँ कि कुछ दिनों बाद फैजाबाद (आज का अयोध्या) घर गया तो पता चला कि दो लोग कुछ समय पहले आये थे,और मेरे बारे में पता कर रहे थे. तब अम्मा-बाबू को लगा था कि शादी वादी के चक्कर के लिए जानकारी ले रहे होंगे.   

पत्रकार का कार्ड चाहिए,पर पत्रकारिता नहीं करनी

     अपने चालीस साल की पत्रकारिता में मैं  कभी प्रेस के 'आई कार्ड' के लिए व्याकुल नहीं रहा ,बहुत से अख़बारों में काम किया जिसका आई कार्ड कैसा होता है ,यह आज तक नहीं जान सका.दैनिक आज से डेस्क पर काम शुरू किया था,लेकिन आज तक नहीं मालूम की उसका आई कार्ड किस रंग का था.कभी आवश्यकता ही नहीं पड़ी और अपने प्रभारी से पूछने तक की हिम्मत ही. विश्वमानव (सहारनपुर/करनाल ),उत्तरकाल(गुवाहाटी,असाम),जनसंदेश(दिल्ली,गुड़गाँव)सहित बहुत सी पत्र-पत्रिकाओं का संवाददाता /प्रतिनिधि भी रहा पर कभी किसी से आई कार्ड की मांग नहीं की और न ही किसी ने दिया.इसे आप मेरी मुर्खता समझ सकते हैं. क्यों कि पत्रकारिता के क्षेत्र मैं आप की पहचान आप के संस्थान से तो होती ही है और साथ होती है आप के काम से.आप का काम ही आप का नाम होता है ,जिसके लिए किसी आई कार्ड की जरुरत नहीं होती है.

   यह बात इस लिए कह रहा हूँ कि आज लोग ,विशेषकर युवा पत्रकारिता के लिए व्याकुल रहते हैं,लेकिन उन्हें पत्रकारिता का 'क,ख,ग' तक नहीं पता होता .लेकिन उनके गले में लाल,नीली या पीली पट्टी में फंसा एक कार्ड जरुर लटकता दिखाई देगा.इसका गत पांच वर्षों में मैं ने अनुभव किया है. इन पांच सालों में 'प्रणाम पर्यटन' एवं उसकी सहयोगी समाचार पत्रिका 'वसुंधरा पोस्ट' के लिए पचास अधिक पत्रकारों को परिचय-पत्र जारी किया होगा ,लेकिन इन पचास में से मात्र दो-चार सहयोगी ही ऐसे मिले जिन्हें पत्रकारिता की समझ है, इनमें महिला पत्रकारों व सहयोगियों पर अधिक विश्वास किया जा सकता है.कारण वह ईमानदारी के साथ अपने दायित्व का निर्वाह करती हैं. उनकी लेखनी पर विश्वास किया जा सकता है.

        आज पत्रकारिता मिशन नहीं व्यवसाय बन चुका है,इस लिए मिशन की बात की ही नहीं जानी चाहिए.मज़े की बात यह है कि लघु पात्र-पत्रिकाएं ही सबसे अधिक 'पत्रकार'होने का 'प्रमाण पत्र' का सर्टिफिकेट यानि आई कार्ड बांटती हैं,इसके पीछे  क्या कारण है ? यह इससे जुड़े सभी को मालूम है.मुझे कुछ कहने की जरुरत नहीं है.

  अधिक बातें न करते हुए सीधी सी बात कहता हूँ की जिन लोगों को (कुछ लोग को छोड़कर)अबतक  'प्रणाम पर्यटन' एवं वसुंधरा पोस्ट' का आई कार्ड प्राप्त है, उनकी अंतिम तिथि से स्वयम निरस्त हो जायेगा .नवीनीकरण की प्रक्रिया संभव नहीं होगी. इसी के साथ सभी को प्रणाम)


मंगलवार, 28 दिसंबर 2021

फोटो के साथ हुईं रस्में

 


अयोध्या और....7

           दो माह बाद यानी 27 फरवरी को वैवाहिक जीवन के पूरे तीस साल हो जायेंगे ,अब आप कहेंगे कि यह भी कोई बात हुई ,सही भी है. पर इसी बात में ही तो बात है.मुझे लगा कि विवाह को लेकर जो कुछ मेरे साथ हुआ ,वह कम रोचक नहीं है ,इसलिए आप सभी के साथ साझा कर रहा हूँ ,शायद आप को जानकर अच्छा भी लगे.

        बात सन 1992 के जनवरी माह की है.उन दिनों मैं हरियाणा के गुड़गांव (अब गुरुग्राम) से निकलने वाले हिंदी दैनिक 'जनसंदेशमें बतौर फीचर संपादक कार्यरत था.उम्र यही तीस से थोड़ा अधिक .या यूँ कहें कि शादी करने वाली हो गई थी.अम्मा-बाबू इस बात के लिए परेशान भी रहते,रिश्ते कम ही आते ,जो आते भी वो इस लिए बिदक जाते की 'लड़का पत्रकार है,क्या कमाता होगा क्या खुद खाएगा,और क्या मेरी बेटी को खिलायेगा. उसका मुख्य कारण था कि उन दिनों अख़बारों मैं वेतन की बहुत बुरी स्थिति हुआ करती थी. बात भी सही थी. डेस्क पर काम करने वालों की पूछिए ही नहीं. तीन चार विकली आफ़ में काम कर लिया तो आगे वही छुट्टी एक साथ लेकर घर जाना हो जाता.

    इसी क्रम में उस वर्ष 26 जनवरी अर्थात गणतंत्र दिवस रविवार को पड़ रहा था ,इस लिए चार दिन की और छुट्टी लेकर अपने घर फैजाबाद(अब अयोध्या)जाने का कार्यक्रम बनाया ,विधिवत संपादक जी से स्वीकृत भी करा ली. उन दिनों फोन अरे वही चोगा वाला ,सभी के यहाँ तो होते नहीं थे ,जिसके घर होता भी था तो उसकी हालत पूछिए ही मत.ख़ैर साहब मेरे घर से लगकर चार-पांच घर छोड़ कर मास्टर चाचा (स्व शांति स्वरूप वर्मा जी,वाही मनोहर लाल स्कूल वाले) के यहाँ होता था ,एक कहावत है न गांव की भौजाई -जगभर की भौजाई ,बस वाही हालत उस फ़ोन की थी. हां तो बता रहा था कि 24 जनवरी की रात संपादक जी से घर बात करने की अनुमति लेकर फोन मिलाया और छोटे भाई को बुलाने का आग्रह कर फोन काट दिया. लगभग चालीस मिनट के बाद फिर मिलाया .इतना लंबा गैप इसलिए जहाँ फोन किया था वहां से कोई घर जा कर यह संदेश तो दे सके,और वह वहां आ सकें.

      छोटा भाई फोन पर आया ,उससे मैं जैसे ही कहा कि कल रात (25 की)चल कर 26 की सुबह घर पहुंच रहा हूँ,इतना कहना ही था की दूसरी तरफ से तपाक से बात काटते हुए भाई बोला कि अच्छा  हुआ की फोन कर लिया,हम लोग करने ही वाले थे,यह सुनकर मैं सकपका गया ,लगा की बाबू की तबियत अधिक ख़राब हो गई क्या,जो बताया नहीं. अभी कुछ बोलता ही कि उसने बोला की 'आ जाओ ,जरुरी है,तुम्हारी शादी तय हो गई है,यह सुनकर मैं हक्का-बक्का रह गया ,तभी सामने बैठे संपादक जी ने मेरे चेहरे के भाव देख कर पूछ बैठे क्या हुआकुछ छड  सोचकर उन्हें यह जानकारी दी. जिसे सुनते ही उन्होंने पहले आशीर्वाद दिया,उसके बाद मिठाई के नाम पर रात्रि पाली के सभी (पूरे प्रेस कर्मियों को चाय पिलवाई. आखिर गुडगांव के उस छोटे से कापसहेड़ा कस्बे में इतनी रात मिठाई कहाँ मिलती.

      ख़ैर साहब 25 को चल कर 26 की सुबह फैजाबाद घर पंहुचा तो सारा वाक्या का पता चला . हुआ यूँ कि 16 जनवरी को मेरी पत्नी के माता-पिता उनको लेकर फैजाबाद आये और मिलिट्री मंदिर देखने-दिखाने का क्रम चला.छोटा भाई भी साथ ही था. अम्मा को लड़की भा गई ,बात फिट . वह इसलिए कि शादी के लिए मैंने पहले ही कह रखा था कि आप लोग (जिसमें दोनों बहने बहनोई एवं भाई शामिल थे) जहाँ चाहो करो,मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी. हुआ भी वही . अम्मा-बाबू एवं भाई इन्हें देख कर लोटे ही थे कि इतने में बनारस से छोटी बहन-बहनोई पहुँच गए ,सभी को अच्छे कपडे(भाई तब कहीं बहार जाना होता था तो कुछ अच्छे कपड़े होते थे जिन्हें पहना जाता था,आज की तरह ब्रांडेड नहीं) में देख कर पूछा तो अम्मा ने सारी बातें बता दीं. बस क्या था ,यह तय हुआ कि बरीक्षा व गोद भराई की रस्म कल ही कर दी जाये. बस रात 10 बजे छोटे बहनोई और भी इनके मामा के घर पहुँच गए ,जहाँ सभी लोग रुके थे.इतनी रात को सभी को देख कर उन लोगों को कोई आशंका हुई ,लेकिन जब बताया गया की कल दोनों रस्में करनी है,तो थोड़ी रहत उन सबको मिली.इसी बीच छोटे बहनोई साहब सुबह ही अमेठी पहुंचे और जीजा ,जिज्जी व बच्चों को लेकर फैजाबाद पहुँच गए. फिर फोटो के आधार पर सारी प्रक्रियाएं पूरी करवाई गईं. और इस तरह से अगले माह की 27 तारीख (फरवरी 1992) को हम सप्तपदी के सात फेरों के साथ बांध दिए गए.

    शादी के बाद जब वापस गुड़गांव लौटा तो पता चला कि चौटाला (ओम प्रकाश चौटाला,पूर्व मुख्यमंत्री ,हरियाणाआज कल सरकारी मेहमान बन कर संखिचों के पीछे हैं ) ने एक साथ पुराने 35 कर्मियों को बहार का रास्ता दिखा दिया था,जिसमें मेरा भी एक नाम था. अब आप सोचो ,शादी के बाद लोग हनीमून (तब तो यह सब होता नहीं था,यूँ ही लिख दिया)पर जाते थे ,लेकिन इधर तो संसथान ने ही बहार का रास्ता दिखा दिया था.उन दिनों को याद कर रूह कांप जाती है. ख़ैर ....

इसी के साथ अयोध्या और ... समाप्त       

 

शनिवार, 11 दिसंबर 2021

खजुरहट बनाम ननिहाल अर्थात अम्मा का मायका

 अयोध्या और मैं -6

         जहाँ तक  मैं समझता हूँ कि देश के नब्बे प्रतिशत बच्चों से यदि गांव के बारे में पूछा जाये तो वह अपने ददिहाल के बजाय ननिहाल का ही जिक्र करेंगे .करें भी क्यों न ,क्यों कि जो मान-सम्मान प्रतिष्ठा उन्हें अपने माँ के गांव में मिलती थी /है वह अपने पिता के गांव में नहीं .मैं ने भी अपने गांव को अपने ददिहाल से कहीं अधिक ननिहाल में देखा है. जहाँ हर साल गर्मी की छुट्टियों में पूरा दो माह बिताते थे .

        20 मई की सुबह 10 बजे तक स्कूल में परीक्षा परिणाम (रिजल्ट) लेने के बाद नानी के पास जाने का निर्धारित कार्यक्रम तय रहता ही था . मेरा ननिहाल फैजाबाद शहर से मात्र तीस किलोमीटर दूर सुल्तानपुर रोड पर बीकापुर तहसील के अंतर्गत एक प्रमुख बाज़ार है खजुरहट के निकट गड़ई गांव में है .जहाँ आज भी मामा -मामी उनके बच्चे ,बच्चों के बच्चे रहते हैं . हाँ तो कह रहा था कि रिजल्ट लेने के बाद हम दो भाई (मुझसे छोटा) दोपहर की एक बजे फैजाबाद से इलाहबाद (आज जिसे प्रयागराज का नाम मिल गया है)जाने वाली सवारी गाड़ी पकड़ लेते और लगभग एक से सवा घंटे का सफ़र छुक-छुक रेल गाड़ी से तय कर खजुरहट स्टेशन पर उतर जाते . तब हाथ में कोई बैग या ब्रीफकेस तो होता नहीं था ,अम्मा के हाथ का सिला दो टंगने वाला "झोला" ही होता था जिसमें दो -तीन निकर ,बुशर्ट ,पटरी वाली जांघिया होती. खजुरहट स्टेशन से नाना का गांव लगभग पांच किलोमीटर तो होगा ही ,स्टेशन से उतर कर खेतों के बीच पगडंडियों को पकड़ कर चल देते ,तब गांव मैं रिक्शा या अन्य साधन नहीं थे न भाई,सो पैदल ही चलना पड़ता था. उस समय उम्र रही होगी 13-14 साल ,जहाँ तक याद आ रहा है ट्रेन का टिकट होता था एक रुपये. स्टेशन से गांव जाने में खजुरहट बाज़ार पड़ता ,जहाँ पर छोटे मामा की किराना की एक छोटी सी दुकान थीथोड़ी देर वहां पर रुकना ,लेमन चूस चुसना फिर गांव जाने वाले किसी की साईकिल पर मामा बैठा देते ,और पहुँच जाते नानी के पास.

        नाना पांच भाइयों मैं सबसे बड़े थे ,जिनका नाम था चंद्रभान लाल ,उनके बाद सूर्यभान,शशिभान ,रविभान एवं सबसे छोटे नाना का नाम था रुद्र्भान लाल . शशिभान  नाना प्रधान थे,रवि भान नाना खजुरहट इंटर कॉलेज में आर्ट के मास्टर थे,इसलिए उन्हें सभी मास्टर नाना कहकर बुलाते थे. सूर्यभान एवं रूद्र भान नाना फैजाबाद कचहरी में वकालत करते थे. मास्टर नाना का निधन बहुत कम उम्र मैं हो गया था,उनकी हलकी सी स्मृति ही मस्तिष्क में है.मेरे नाना यानी चंद्रभान लाल बनारस के उद्योगपति के यहाँ उस समय में मैनेजर हुआ करते थे. झक सफ़ेद धोती ,कलफदार सफ़ेद कुर्ता उस पर खादी की सदरी एवं सर पर टोपी  उनका नियमित पहनावा था.नाना के पिता जी यानी मेरे परनाना का नाम था गंगा सहाय ,नाना की दो बहने भी थीं,जिन्हें हम लोग बड़की बुआ एवं छोटकी बुआ नानी के संबोधन से बुलाते थे . बड़की बुआ नानी को कोई बच्चा नहीं था,जबकि छोटकी बुआ नानी को एक लड़की एवं तीन लडके थे. नाना के पांचो भाइयों से 11 लडके एवं 11 लड़कियां थीं. इन सबमें मेरी अम्मा (नाम उमा था पर घर वाले बुंदल के नाम से संबोधित करते थे)सबसे बड़ी थीं . जिनका पूरे  गांव में इतना सम्मान था कि पूछिए नहीं. इस लिए गड़ई गांव में घुसते ही लोगों को पता चल जाता था कि बुंदल के बच्चे आयें हैं. किसी के खेत से गन्ना हो या गंजी उखाड़ लोकिसी के आम के बाग़ से आम तोड़ लो कोई बोलने वाला नहीं ,मतलब ननिहाल में सौ खून माफ़.

      नाना के साथ अपनी नानियों के बारे मैं भी बताता चलूँ. मेरी नानी सुंदरी देवी सबसे बड़ी थीं,गोरी,कद काठी की अच्छी ,परिवार के सभी लोग उन्हें दुध्धू अम्मा के संबोधन से बुलाते थे.पूरे घर का नियंत्रण उन्ही के हाथ में था .यद्यपि सभी नानियों का अपना-अपना काम बटा था.दूसरे व तीसरे नंबर वाली नानी फैजाबाद में रहती थी.तीज -त्यौहार एवं गर्मियों की छुट्टियों मैं ही उनका गांव आना होता था. गांव पर रहने वाली नानियों में मेरी नानी व उनके बाद प्रधान नाना वाली नानी और मास्टर नाना वाली नानी ही रहती थी. प्रधान नाना वाली नानी को प्रधानीन नानी एवं मास्टर नाना वाली नानी को करसारी वाली नानी कह कर बुलाते थे,कारण  उनका मायका करसारी गांव में था. पुरे घर का देखभाल -हिसाब-किताब मेरी नानी के पास होता था. जबकि गल्ला-पानी का नियंत्रण प्रधानीन नानी के पास . प्रधानीन नानी एवं करसारी वाली नानी के हिस्से में पूरे घर का खाना सुबह-शाम बनाना अतिरिक्त जिम्मेदारी थी . तब बड़े-बड़े हंडों में रोज का खाना बनता था ,आज की तरह प्रेशरकूकर में नहीं. सब्जी-भाजी का मामला बड़ी नानी के पास. जब फैजाबाद वाली दोनों नानियाँ आतीं तो उनके जिम्मे भी  खाना बनाने का दायित्व बढ़ जाता.   

    गांव का नाम 'गड़ईक्यूँ पढ़ा यह तो नहीं मालूम लेकिन गांव में कई छोटे-छोटे तालाब जरुर थे,जिसे स्थानीय भाषा में गढ़ई बोलते थेउन तालाबों से बहुत मछली  मर कर खाई है. अब तो उन तालाबों की जगह छोटे-छोटे घरों अपना कब्ज़ा कर लिया है. नाना का घर इसी तरह एक छोटे से तलब के ऊपर टीले पर है ,यह अलग की बात है की समय के थपेड़ों की वजह से उसका स्वरुप जरुर बदल गया है ,लेकिन दिल व दिमाग में आज भी वही नानी -नाना और  अम्मा मतलब 'बुंदल जीयाका मायका अंकित है,अम्मा गांव मैं भी शायद सबसे बड़ी थीं इस लिए उन्हें लोग जीया और 'बुंदल बहिनीकह कर ही बुलाते थे . 'गड़ईमें लगभग सौ घर तो रहे होंगे उस समय,जिनमें सभी जाती धर्म के लोग रहते थे,मिलनसार इतने कि किसी के यहाँ किसी तरह काम-काज होता तो पता ही नहीं चलता की कैसे हो गया.

  चलते-चलते बताता चलूँ की उस समय नाती और भांजे होने का कितना लाभ मिलता था कि पूछिये नहीं. गांव मैं दो-तीन घर मुस्लिम परिवार के भी थे . उनमें एक घर था मौलवी नाना का ,उम्र रही होगी सत्तर-अस्सी साल के बीचगर्मियों की छुट्टी मैं सभी मामा ,मौसियों का परिवार तो इकठ्ठा ही होता था,दर्जनों बच्चे मौलवी नाना के यहाँ अक्सर मठ्ठा पीने को मिलता ही था .अगर किसी दिन नहीं मिला तो ,बस पूछिए मत . उस ग्रुप में जो बच्चा बड़ा होता वह लीडर होता,उस दिन वह आगे चलता और मोलवी नाना के इर्दगिर्द चक्कर लगते हुए नारा लगते 'मोलवी साहब बंदगी .... फिर उनके पीछे चलने वाले बच्चे बोलते पा..ओं सारी  जिंदगी '. मौलवी नाना अपनी छड़ी लेकर मारने दौड़ते .लेकिन कभी भी मौलवी नाना ने किसी बच्चे पर पर हाथ नहीं उठाया. बल्कि बुला कर मठा जरूर पिलवाते थे. यह होता था ननिहाल का वह सुखजिसकी कल्पना आज पीढ़ी  कर नहीं सकती .

(इसके बाद की बात अगले रविवार को यहीं पर)  

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2021

बच्चे ,...चाचा और चौक

अयोध्या और मैं 5

     यह शास्वत है कि बचपन में हर बच्चा चंचल,नटखट एवं शैतान तो होता ही है ,यह अलग की बात है कि उसकी शैतानियाँ किस तरह की हो. इस बात से कोई भी इन्सान इंकार नहीं कर सकता कि उसने शैतानियाँ न की हो. हाँ उम्र के इस पड़ाव में लोग-बाग़ अपनी बचपन की शैतानियों को अपने बच्चों के सामने कहने से हिचकते जरुर हैं. कभी -कभी कई बच्चे मिल कर  कोई ऐसी शैतानी करते हैं तो उसका परिणाम ख़राब भी हो सकता है . अपने मोहल्ले के शैतान बच्चों में मैं भी शुमार था ,उन दिनों जो शैतानियाँ की थी उसे याद कर आज भी रंगोटे खड़े हो जाते हैं. ख़ैर साहब आप सब के सामने बताने मैं कोई हिचक महसूस नहीं कर पा रहा हूँ.

शहर के पुराने मोहल्ले की संरचना अपने मष्तिक में कर लीजिये ,यह इस लिए कि अब मोहल्ले कम कालोनियां अधिक उग आईं  हैं.ऐसा ही फैजाबाद शहर के बीच हमारा मोहल्ला है 'तेली टोला', तेली टोला नाम क्यों पड़ा इसका कोई इतिहास लिखित रूप में नहीं है. बचपन में जो बुजुर्गों से सुनता था उसके मुताबिक इस मोहल्ले में कड़ुआ तेल (सरसों का तेल,जिसे आज की पीढ़ी मस्टर्ड आयलके नाम से जानती है) का व्यवसाय करने वालों की आबादी अधिक थी,इसी कारण मोहल्ले का नाम तेली टोला पड़ा .वैसे इस मोहल्ले में सभी जाती व समुदाय के लोग रहते हैं,परन्तु कभी भी किसी तरह का विवाद या संघर्ष नहीं हुआ.

   तेली टोला मैं लालाओं यानी कायस्थों की संख्या बहुल्य है. बात सन 1972-73 की ही होगी ,एक चाचा रहते थे ,उस समय उनकी उम्र रही होगी 60 के ऊपर ही , बच्चे-बूढ़े ,जवान सभी ....लाला के नाम से पुकारते थे ,मतलब फलां चाचा ,फलां बाबा आदि-आदि . उनकी आदत थी कि वह कभी भी अपने घर के भीतर नहीं सोते थे. अच्छी तरह याद है कि उन्हें घर के बाहर ही एक छोटी सी चारपाई (जिसे स्थानीय बोली में खटोला बोलते हैं) पर ही सोते देखा था. जो लोग मोहल्ले में पले-बढ़े उन्हें मोहल्ले के वातावरण की अच्छी जानकारी होगी ही. मेरे घर के सामने एक कुआं था (है तो अभी भी लेकिन अब वह आधुनिक मकान की चाहर दीवारी में कैद है)वहीँ पर रात  आठ बजे खाना खाने के बाद सभी की बैठकी लगती थी. एक रात हम लोग एक कवि  सम्मलेन सुनकर लौट रहे थे , ...चाचा को मोहल्ले के लड़कों ने घर के बहार सोते देख लिया ,फिर क्या दिमाग में बदमाशी सूझी और उन्हें चारपाई सहित अहिस्ता से बिना किसी शोर-शराबे के उठाया और चौक घंटा घर पर छोड़ कर भाग लिए. सुबह लगभग चार बजे के आस-पास जब चाचा की नींद खुली तो अपने को घंटाघर के नीचे लेटा देखकर हैरान हो गए . उनकी समझ में यह नहीं आ रहा था कि आखिर वह यहाँ तक पहुंचे तो कैसे? फिर वह समझ गए कि यह सब मोहल्ले के बदमाश लड़कों की ही शैतानी होगी. बेचारे किसी तरह अपने खटोला को लेकर घर पहुंचे .

  इधर पूर्व दिशा में अपनी शीतल लालिमा को सूर्य देवता रंग बदलते हुए ऊपर चढ़ रहे थे,उधर चाचा  रात की घटना से क्रोधित होते हुए बदमाश टोली के बच्चों के घरों पहुँच कर घटना की जानकारी का उलहेना (शिकायत) दे रहे थे.भाई साहब उसके बाद की घटना का उल्लेख करना बेकार ही होगा ,वह तो आप समझ ही गए होंगे कि उस सुबह नाश्ते में क्या मिला होगा. वह दिन याद कर आज भी दर्द उठ ही जाता है. वहीँ अपने किये पर अब पछतावा होता है ,लेकिन कबीर का लिखा  दोहा ,'अब पछताय होत का ,जब चिड़िया चुग गई खेत', के लिए प्रयाश्चित तो किया ही जा सकता है न.

  चलते-चलते यहाँ पर दो बातों का उल्लेख जरुर करना चाहूँगा ,पहला यह कि उन .... चाचा के नाम का उल्लेख इस लिए नहीं किया ,क्यों की उनके नाती-पोते हैं. किसी परिवार के बारे में कुछ भी कहना न्यायोचित नहीं है और कभी उनके परिजनों को मैं अकेला मिल गया तो सोचिये इस बुढ़ापे में मेरा क्या होगा..हा.हा..हा...|दूसरी महत्वपूर्ण बात ,तब फैजाबाद (आज का अयोध्या जिला) इतना संवेदनशील नहीं था, आज दिन रात व्यस्त रहने वाला शहर का मुख्य बाज़ार चौक शाम नौ बजे के बाद सुनसान हो जाता था. कभी कदापि पुलिसिया गाड़ियाँ ही दौड़ती थी.दंगा-फसाद यह सब तो अस्सी के दशक के बाद शुरू हुआ मेरे भाई. अमन-शांति और चैन का शहर था अपना छोटा सा अंचल फैजाबाद.  

(फैजाबाद ,चौक का प्रतीकात्मक फोटो)  

     

कताई-बुनाई ,गाँधी और वर्धा

 अयोध्या और मैं -

     मैं इस समय महात्मा गाँधी की कर्मभूमि वर्धा के बापू कुटी में हूँ. विगत चार सालों में मेरी यह चौथी यात्रा है.पच्चीस सालों तक इस रेल खंड पर न जाने कितनी बार यात्रा की ,लेकिन कभी इन स्टेशनों (वर्धा/सेवाग्राम) पर उतरा नहीं ,पर अब यही स्टेशन बार-बार उतरने को मजबूर कर देता है. उम्र की अंतिम बेला में बापू का यह धाम मुझे इतना लगाव देगा ,इसका मुझे कभी अहसास ही नहीं हुआ.महात्मा गाँधी के प्रति इतना अपनत्व हो जायेगा ,पता नहीं था. यह सब हुआ भी तो पिछले सात-आठ सालों में. इस बीच गाँधी को बहुत पढ़ा ,जाना , और जानने की इच्छा भी जगी. पूरी जवानी और प्रौढ़ अवस्था में गाँधी को इतना नहीं जान सका था.

   जैसा कि पिछली श्रंखला में लिखा था कि बाबू (पिता जी ) का तबादला गोरखपुर से फैजाबाद (अब अयोध्या) हो गया ,पांचवी पास कर के आया था , सो छठवीं में एडमिशन लेना था. मोहल्ले में चार-पांच मकान छोड़ कर एक मास्टर चाचा रहते थे. जिनका नाम था स्व शांति स्वरुप वर्मा , जिन्हें वर्मा मास्टर के नाम से सारा शहर जनता था. मास्टर चाचा मनोहर लाल मोती लाल इंटर कालेज (एम्.एल.एम्.एल.इंटर कालेज) में भौतिक विज्ञानं के प्रवक्ता थे.उस विषय पर उनकी गहरी पकड़ थी , दूर-दूर से लोग उस समय उनसे ट्यूशन पढ़ने आते थे.उनमे से एक वर्तमान अयोध्या राजा भी थे. उन्ही के माध्यम से छठवीं में नाम लिख गया.

    उस समय छठवीं से आठवीं तक सभी विषयों के साथ एक अनिवार्य विषय भी लेना पड़ता था.मनोहर लाल में इसके लिए दो विषय थे पहला - सिलाई एवं दूसरा था कताई-बुनाई .सिलाई में कपडे में काज़ बनाना ,रफू करना,बटन टाकना आदि सिखाया जाता था ,जिसके मास्टर थे रस्तोगी मास्टर साब ,जो बाबू के सहपाठी भी थे. कताई-बुनाई वाले मास्टर साब का नाम ठीक से याद नहीं आ रहा है ,पर शायद बारी मास्टर साब नाम था उनका. में ने कताई-बुनाई विषय लिया था. जिसमे हाथ सूत कातना,खादी के कपडे बनाये जाने की प्रक्रिया के साथ-साथ चरखों के प्रकार आदि की शिक्षा दी जाती थी. उस कक्षा में जमीन पर ही बिछे टाट-पट्टी पर बैठना होता था ,तब हम लोगों को यरवदा चरखा आदि के बारे में पढाया गया था ,और तो आज तक ठीक से याद भी नहीं है.

     उन्ही दिनों दो अक्टूबर को गाँधी जयंती पर कोई विशेष आयोजन हुआ था, मेरा एक विषय 'आर्ट' भी था,जिसके मास्टर साब थे प्रेम शंकर श्रीवास्तव. उन्हों ने उस समय मुझे गाँधी जी का एक पोस्टर बना कर लाने को कहा था. मेरे सामने एक बड़ी समस्या खड़ी हो गई कि  बनाऊ तो कैसे ,विषय तो केवल पास होने के लिए ले रखा है. ख़ैर साहब कहावत है न कि 'मरता तो क्या न करता' वाली बात को सिद्ध करते हुए घर के बगल में रहने वाले एक बढे भाई साहब के शरण में पहुंचा. जिन्हें हम लोग लल्लू दद्दा (उनका घर का नाम था) संबोधित करते थे. वह जल-निगम में किसी पद पर सेवारत थे.उनकी आर्ट देखने वाली थी. उनके बनायी पेंटिंग मानो बोल उठेगी की बात को चरितार्थ करती थी. उन्होंने ने मात्र एक घंटे में महात्मा गांधी का एक चित्र लाठी के सहारे पीछे से जाते हुए बनाया था. जिसके नीचे मेरा नाम प्रदीप कुमार, कक्षा -आठ ,अ लिख दिया था .उस पोस्टर को कालेज में जमा कर दिया. बाद में वह पोस्टर प्रिंसपल साहब (उन दिनों स्व रामहेत सिंह जी हुआ करते थे) के कमरे मैं काफी दिनों तक लगा रहा.

 कहाँ अयोध्या,कहाँ वर्धा यानी सेवाग्राम महात्मा गांधी की कर्म भूमि. श्री राम मर्यादा के लिए पुरुषोत्तम कहलाये तो गाँधी जी ने अहिंसा के लिए महात्मा बना दिए गए. वर्धा की यही भूमि जहाँ से 23 सितंबर 1933 को महात्मा गाँधी के पांव पड़े थे,और 16 जून 1936 से यहीं रहने लगे थे. इसी भूमि से विनोद भावे ने 1951 में भूदान आन्दोलन की शुरुआत की थी. (शेष अगले रविवार को)

 

"मामा शकुनी और उनकी शव यात्रा"

 अयोध्या और मैं /अल्हड़ नादानियाँ -3

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     महाभारत के  एक प्रमुख पात्र हैं मामा शकुनी,जिनकी कहानियां सर्व प्रचलित हैं ही . जिन्हों ने अपने व अपने परिवार के प्रतिशोध के चलते 'महाभारत ' की संरचना ही कर डाली ,यह सभी को मालूम ही है . आज भी हर परिवार में जब कोई सदस्य नाराज़ होता है तो उसे यह संज्ञा बड़ी आसानी से दे दी जाती है,चलो ,'बहुत मामा शकुनी' मत बनो. मामा शकुनी के बाद 'कंस मामा' की उपाधि मिलना कोई कठिन बात नहीं है ... ख़ैर यहाँ पर जिन मामा शकुनी की बात कर रहा हूँ उनका व  उनके परिवार का उपरोक्त वर्णन से कोई सम्बन्ध नहीं है.

  बात सत्तर के दशक की है,बाबू का तबादला गोरखपुर से फैज़ाबाद (अब अयोध्या) हो गया , परिवार क्या नाते रिश्तेदारों में ख़ुशी की लहर . ददिहाल से परिवार में बाबू सबसे बड़े उधर ननिहाल में अम्मा तो पांच नानाओं के बच्चों में सबसे बड़ी. शहर के बीचो बीच अपना मकान, बाबा ,दादू , चाचा -चाची तो रहते ही थे ,मोहल्ले में दो बुआ का परिवार भी रहता था. उधर अम्मा के दो चाचा यानी मेरे नाना का घर भी था, दोनों नाना स्व सूर्य भान लाल श्रीवास्तव एवं स्व  रुद्र्भान लाल श्रीवास्तव अपने समय के फैजाबाद  दीवानी के प्रसिद्ध वकील थे . अम्मा उस परिवार की सबसे बड़ी या यूँ कहें लाडली बेटी जो थीं.

 हम लोग गोरखपुर से अपने गृह नगर आ गया ,गोरखपुर में गोलघर के पीछे जुबली मानटेन्शसरी  से पांचवी कक्षा पास कर जिला अस्पताल के सामने के एम. एल एम एल इंटर कालेज में छठवीं कक्षा में प्रवेश मिल गया. गोरखपुर में सिविल लाइन जैसे सभ्रांत ईलाके में रहते थे,अब ठेठ पुराने मोहल्ले में आ बसे. वही बात न कि 'असमान से गिरे खजूर पर अटके' वाली कहावत को चरितार्थ हो गई. मोहल्ले के परिवेश में रच-बस गया. मोहल्ले की हर गतिविधियों में बचपन से ही भाग लेना एक शगल सा था.

 हमारे मोहल्ले में एक वयोवृद्ध बाबा ,जिन्हें सभी मामा शकुनी के नाम से बुलाते थे, जहाँ तक मुझे याद है की वह इसका बुरा भी नहीं मानते थे.वह अविवाहित थे . एक छोटे सी कोठरी (कमरा) में वह रहते थे ,उसी में सोना ,खाना बनाना आदि सब कुछ. हाँ फ्रेश (निपटान )के लिए खेतों में चले जाते . पीने का पानी 'सरकारी कल' मतलब नगर पालिका के 'सार्वजानिक नल' से ले कर काम चलाते. उस समय उनकी उम्र रही होगी सत्तर से अधिक,सांवला , सामान्य कद ,लेकिन दिमाग से कहीं तेज. कभी भी वह न तो शांति से बैठे और न ही मोहल्ले वालों को बैठने दिया. आये दिन उनके घर के पास दिन में किसी न किसी मामले में उल्हाना देने वालों का जमावड़ा लगा ही रहता. उस समय उनके शांति भाव को देखने वाला होता. जैसे कुछ हुआ ही नहीं ,न ही उनकी उसमे कोई भूमिका रही हो .फिर भी मोहल्ले भर के बच्चे-बूढ़े ,महिलाएं उनका बहुत आदर करते थे.उसका जो भी कारण रहा हो ,लेकिन मुख्य था उनके आगे-पीछे कोई नहीं था .एक कहावत है न 'आगे नाथ न पीछे पगहा.' बस वाही वाली हालत. एक रात वह जो अपने कमरे में सोये तो फिर उठे ही नहीं. सुबह चार - पांच बजे उठाने वाले मामा के कमरे का किवाड़ नहीं खुला तो अगल-बगल वालों को चिंता हुई, ख़ैर साहब दरवाजे को खोला गया तो अन्दर 'मामा शकुनी' (उनका असली नाम आज तक किसी को भी नहीं मालूम है)चिर निंद्रा में सोये हुए थे. यह बात जंगल में लगे आग की तरह पूरे ईलाके में  फैल गई. मामा उम्रदराज भी थे,मोहल्ले वालों ने गाजे-बाजे के साथ उनकी शव यात्रा निकलने का निर्णय लिया.

    दिन के तीसरे पहर , यही लगभग तीन बजे का समय रहा होगा... उनके शव को एक सजीधजी कुर्सी पर बैठा कर अयोध्या में (तब अयोध्या एक छोटा सा क़स्बा ही था) सरयू के किनारे अंतिम संस्कार के लिए निकला ,वह भी पैदल.जिसकी दूरी लगभग पांच किलोमीटर थी,आज भी उतनी ही है.उस यात्रा में मोहल्ले के बहुत सारे बच्चे भी शामिल थे,जिनमे एक में भी था. फैजाबाद से अयोध्या तक रस्ते भर अंतिम यात्रा में बोले जाने वाले शब्दों ... राम नाम सत्य है के बाद सभी एक अपशब्द का प्रयोग करते हुए .... बड़ा मस्त है ,कहते हुए ले गए. रस्ते में जिस ने भी उस दिन उनकी अंतिम यात्रा को देखा होगा वह आज तक नहीं भुला होगा. हम बच्चों का उसमें जाने का कोई और कारण नहीं था. बस इतना था कि सारी क्रियाएं  पूरी होने के बाद एक घाट पर एक पेड़ा या कोई और मिठाई के साथ एक कुल्ल्हड चाय मिलेगी .

    जाने में तो चला गया ,लेकिन वापसी की बात तो पूछिएगा ही मत.बड़े लोग तो निकल लिए ,बचे तो हम दो -तीन बच्चे . किसी तरह अँधेरा होने के बाद घर पहुंचे.उधर अम्मा-बाबू को खबर हो गई थी कि घाट पर गया है. भाई फिर तो जैसे घर में घुसने के पहले की जो विधि-विधान की प्रक्रिया करनी थी ,वह निर्बाध रूप से संपन्न करवा दी गई, अभी कुछ सम्हला ही था कि पीछे से बाबू का जो थप्पड़ पड़ा तो आँखों के सामने अधेरा छा गया. भाई साहब ! उसके बाद तो पूछिए नहीं ... अभी भी उधर की ओर जाने से डर लगता है. आखिर एक दिन जाना तो है ही . न  चेतन मन से अवचेतन मन से ही सही. यही प्रक्रति का नियम है या यह कहें विधि का विधान है,जो शास्वत है,जिसे झुठलाया नहीं जा सकता.   

(अगले रविवार को एक और रोचक नादानियो के साथ मिलते हैं.)   

 

 

 

'इंग्लैंड-आयरलैंड' और 'अंटाकर्टिका एक अनोखा महादेश'

किताबें-2 श्रीमती माला वर्मा की दो किताबें हाल ही में मिलीं, 'इंग्लैंड-आयरलैंड' और 'अंटाकर्टिका एक अनोखा महादेश' ,दोनों ह...