सोमवार, 13 अप्रैल 2020

इसे कौन सा प्रेम कहेंगे ?


डॉ प्रदीप श्रीवास्तव
लगभग बीस साल पहले स्व चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’जी की सौ साल पुरानी एक कहानी पढ़ी थी जिसका शीर्षक था”तेरी कुड़माई हो गई क्या? जिसकी संरचना आज तक मेरे मस्तिष्क अपनी अमिट छोड़ राखी है । इन दिनों पूरा विश्व एक गंभीर आपदा से जूझ रहा है ,सो मुझे भी घर में रहना ही है। समय भी काटना है, जिसे काटने का सबसे सुंदर तरीका है ,अन्य कामों के साथ पुस्तकें,कहानियाँ पढ़ना । कल यानी 28 मार्च ,दिन शनिवार की अल-सुबह नींद खुल गई ,काफी देर तक लेटा रहा । फिर मोबाइल उठाया और फेसबुक खोल लिया , तभी एफबी के वाल पर किसी की एक कहानी पर निगाह पड़ी ,दो लाइने ही पढ़ी थी कि इतनी अच्छी लगी की पूरा पढ़ डाला । कहानी का शीर्षक याद नहीं ,क्यों कि उसके बाद वह एफबी के वाल पर कहाँ गुम हो गई ,पता ही नहीं चला ,बहुत खोजा पर मिली नहीं। खैर साहब आप भी सोच रहे होंगे कि इसमे कहने वाली क्या बात है ,सही भी है आप का कहना। पर बात है । कहानी की पृष्ठभूमि ही ऐसी है । जिसका लबोलुआब कुछ इस तरह है ।
           एक युवती रक्षाबंधन में अपनी परमपराओं को निभाने दिल्ली में रह रहे भाई के कलाई में रक्षाबंधन बांधने पास जाती है,भाई-भाभी सम्पन्न है । दूसरे दिन वह वहाँ (दिल्ली)से अपने घर लौटती है ,दिल्ली रेलवे स्टेशन पर पहुँचती है,और कानपुर जाने वाली पहली गाड़ी का साधारण क्लास का टिकट लेती है ,और जर्नल डिब्बे में सवार हो जाती है ,त्योहारों पर भीड़ इतनी होती है कि वह अपना रिज़र्वेशन शायद नहीं करा सकी होगी? गाड़ी चलाने को होती है तभी एक सज्जन (यही कहना उचित होगा) आते हें और उसके बगल में बैठ जाते है। वह युवती उसे देख कर चौंकती है,लेकिन कनखी से उसे देखती रहती है। सोचती है क्या वह उसे पहचान नहीं रहा है या फिर न पहचानने का नाटक कर रहा है? इसी उधेड़ बुन में गाड़ी एक लंबा सफर तय कर लेती है,इसी बीच वह अपनी सीट पर अपना हैंड बैग रख कर टाइलेट चली जाती है,जब वह लौटती है तो देखती है कि खिड़की वाली सीट पर उसका बैग हटा कर वह सज्जन बैठ गए हैं । लेकिन वह कुछ बोलती नहीं ,थोड़ी देर बाद वही सज्जन अपनी सफाई देते हुए उससे कहते हैं कि गर्मी अधिक लग रही थी इसी लिए इधर बैठ गया हूँ। फिर भी वह युवती कुछ नहीं बोलती,और मन में सोचती रहती है कि क्या वाकई वह उसे नहीं पहचान रहा है। तभी टिकट चेकर आ जाते हैं ,युवती अपना टिकट उन्हें दिखती है । जब टिकट चेकर उससे टिकट मांगते हैं तो वह बोल पढ़ता है कि टिकट नहीं है? इस पर टिकट चेकर फ़ाईन सहित टिकट बनाने की बात कहता है ,जिस पर वह सज्जन कहते हें कि जितना भी लगता है ,लगे । बना दीजिये। टिकट चेकर स्टेशन का नाम पूछता है तो वह बोलदेता है कानपुर तक का। टिकट देकर वह चला जाता है। इधर कानपुर का नाम सुनकर युवती और परेशान हो उठती है, कि हो या न हो यह जरूर न पहचानने का नाटक कर रहा है। गाड़ी अपनी रफ्तार से दौड़ती रहती है । गाड़ी की गति से युवती के मन की गति बढ़ती जाती है, वह खुद पहल कर उससे पूछती है कि ,क्या आप भी कानपुर में रहते हैं ? इस पर उनका कहना होता है कि नहीं । वह फिर पूछती है तो फिर घूमने जा रहे होंगे,इस पर फिर वही उत्तर उसे मिलता है कि नहीं? वह चौंकती है ,और पूछ पढ़ती है तो फिर क्यूँ जा रहे हैं ? इस पर उसका सीधा सा जवाब होता है ,आप को छोड़ने । इतना सुनते ही उस युवती शरीर में एक कंपन्न सी होती है,और पूछ बैठती है क्यूँ,मुझे क्यों छोड़ने जा रहे है,में तो न आप को और न ही आप मुझे जानते हैं ,फिर क्यूँ?इस पर वह सज्जन पूछ बैठते हैं कि आप दिल्ली क्यूँ आई थीं ,इस पर वह उन्हें दिल्ली आने का प्रयोजन बताती है। इस पर वह कहते हैं कि क्या भाई कानपुर छोड़ने नहीं आ सकते थे । जिस बात प्रा वह युवती कोई बहाना बना कर टाल देती है।
    बातों का सिलसिला चल पड़ता है। आखिर वह पूछ पढ़ती है कि उसे कैसे पता कि वह कानपुर ही जा रही है ,इस पर वह सज्जन बताते कि जब वह टिकट चेकर को अपना टिकट दिखा रही थी तो उसने उस पर कानपुर पढ़ लिया था । इस पर उसने पूछा कि आप ने पहचाना मुझे ,जिस पर वह सज्जन बोले कि मैं ने तो दिल्ली में ही पहचान लिया था ,दिल्ली से ड्यूटी पर जा रहा था तो देखा कि आप अकेली कहीं जा रही हैं तो आप के साथ हो लिया कि जमाना कितना खराब है उस पर आप अकेली जा रही हो,सोचा कि जहां तक जा रही हैं तो वहाँ तक छोड़ आता हूँ। अपना समान अपने सहयोगियों के हवाले कर दिया और आप के साथ चला आया। इतने में गाड़ी कानपुर पहुँच चुकी थी , वे गाड़ी से उतरे और उन सज्जन ने उसे उसके घर तक छोड़ा ,घर पहुँचने के बाद उस युवती ने घर के अंदर आने और चाय पीने का बहुत आग्रह किया ,लेकिन अगली बार आने का आश्वासन दे कर चला गया । एक सप्ताह बीतने के बाद एक दिन अचानक अखबार के एक समाचार पर उसकी नज़र पड़ी तो हवाक रह गई, उसके दोनों नेत्रों से गंगा-यमुना की अविरल धारा बह चली ,काफी देर बाद अपने को संयम किया, खबर थी सीमा पर दुश्मनों के साथ देश की रक्षा के लिए मेजर …. शहीद हो गाए । इसके बाद उसके मन में छात्र जीवन की गतिविधियां चलचित्र की भांति चल पड़ी । जब वे दोनों साथ-साथ पढ़ते थे ,किस तरह वह उसके प्यार के लिए दीवाना था,परंतु कभी भी अपनी सीमा को नहीं लांघा। इस बीच उसके पिता जी का कहीं और तबादला हो गया ,और परिवार वालों ने उसका हाथ कहीं और पीले कर दिये। इसे ही तो कहते हैं “निश्चल प्रेम”।

70-80 का दशक था पत्र-मित्रता का


डॉ प्रदीप श्रीवास्तव
कुछ वर्षों पहले मेरी एक मित्राणी (दोस्त ) ने रोमानिया से एक कार्टून भेजा था  ,जिसमे दो उम्र दराज लोगों को नेट सर्फिंग करते हुए दिखाया है | मजे क़ी बात यह है कि दोनों लोग ही यह सोच कर सर्फिंग कर रहे हैं कि वे नेट पर किसी युवा के साथ चैटिंग कर रहे हैं ,पर दोनों लोग बुजुर्ग हैं । |इस कार्टून को देखने के बाद मेरे  जेहन में एक बात आई कि आज बदलती टेक्नालोजी के इस दौर में हमारी मानसिकता भी कितनी बदल रही है |हम आज भी अपने को युवा देखने क़ी चाह में अपने  सारे बन्धनों को तोड़ने पर विवश हो रहे हैं क्यों ? मित्रता करना कोई गलत बात नहीं है ।
  तीन से चार दशक पहले यानि सन 70 व 80 के दशक में भी एक दौर था मित्रता का। तब उसे नाम दिया गया था pen friendship अर्थात पत्र मित्रता । शायद सदी का स्वर्णिम युग कहा जा सकता है उस दौर को । जब लोग एक-दूसरे को बिना-जाने व समझे दोस्त बन जाया करते थे । जिसमें स्वस्थ मानसिकता की बात होती थी । जहां तक मैं समझता हूँ इन लाइनों को पढ़ने वालों में से आप ने भी जरूर पत्र-मित्रता की होगी। यह बात मैं  डंके के चोट पर कह सकता हूँ । क्यों कि वह दौर ही ऐसा था।
70-80 के दशक में दोस्त बनाने का तरीका भी बहुत सरल होता था। क्यों कि उन दिनों देश में कुछ ही पत्र-पत्रिकाएँ निकलती थीं । जिनमें प्रमुख थीं धर्मयुग ,साप्ताहिक हिंदुस्तान ,(यह सब पारिवारिक पत्रिकाएँ होती थीं ,जो लगभग हर दूसरे घर में पाईं जाती थीं।)। राजनीति में रुचि लेने वाले दिनमान पढ़ते थे । फिल्मी पत्रिकाओं में माधुरी,मायापुरी (हिन्दी) एवं अँग्रेजी में फिल्म फेयर । इन पत्रिकाओं में से एक पत्रिका हर हिन्दी भाषी परिवार में जरूर पाई जाती थी।
    बच्चों का अपना संसार होता था ,उनके अपने खेल होते थे ,आज की तरह मोबाइल व कंप्यूटर तो होता नहीं था। जिस बच्चे में परिवार वालों को जरा सी भी पढ़ने-लिखने की ललक दिखाई देती, उसके घर वाले उसे बाल  पत्रिकाएँ जरूर उपलब्ध करवाते । वे पत्रिकाएँ थीं चंपक, चंदामामा,पराग एवं मधु मुस्कान आदि। जिसको पढ़ने की ललक लगभग हर बच्चे में होती थी। जब पढ़ते थे तो उनमें कुछ लिखने की ललक भी होती। जब लिखा तो सोचते कि अगर मेरी यह रचना कहीं छप जाए फिर क्या बात ? कुछ लोगों कि छपती भी थी। छपने के बाद लिखने की ललक भी बढ़ती जाती। चलते-चलते यह भी बताता चलूँ कि उस दौरान की पत्रिकाओं में तो बच्चों का कम से कम एक पन्ना तो होता ही था,वहीं साप्ताहिक ,पाक्षिक पत्रिकाओं में भी बच्चों का पूरा ख्याल रखा जाता था ।
   उन दिनों चंपक, चंदामामा,पराग एवं मधुमुस्कान आदि पत्रिकाओं में पेन-फ्रेंड का एक कालम भी छपता था। जिसमे देश के कोने-कोने में रहने वाले पाठकों की फोटो के साथ उनका पता,रुचि उम्र भी छपी होती थी। जिसे पढ़ कर बच्चा अपने हम उम्र को पोस्ट कार्ड लिख कर दोस्त बनाते । यही दोस्ती घनिष्ठता में बदल जाती । बाद में लोकप्रियता को देखते हुए कुछ अँग्रेजी की पत्रिकाओं में भी छपने लगा , जिससे उस समय के युवाओं में भी रुचि बढ़ी।
     तब मित्रता के पीछे कोई लाग-लपट नहीं होते थे। उस दौरान मैं ने  भी कई पत्र-मित्र बनाए थे ।उनमें से काइयों का तो पता नहीं ,फिर भी कुछ लोग आज भी संपर्क में हैं । उन दिनों के मित्रों में आज एक मित्र देश के एक बड़े अखबार के प्रधान संपादक भी हैं , तो एक मित्र ने  विभागाध्यक्ष पद से हाल ही में अवकाश ग्रहण किया है। खैर साहब उन दिनो जब दोपहर  में पोस्ट मैन आ कर कोई पोस्ट कार्ड या अंतर्देशीय पत्र देता तो उस वक्त की खुशी को व्यक्त नहीं किया जा सकता। घर में घुसते  ही अम्मा से पूछते कोई चिट्ठी आई है क्या?  किसी -किसी दिन तो अम्मा सामान्य सा जवाब देतीं कि आई है ,उधर मेज़ पर रखी है, लेकिन किसी-किसी दिन खीज कर कहतीं ,हाँ उस डाइन की आई है । इसका भी एक कारण था कि मेरे दोस्तों की सूची में अधिकांश महिला मित्र ही रहीं होंगी ,जिनका  उल्लेख सांकेतिक रूप में आगे करूंगा । हाँ तो कह रहा था कि कभी-कभी अम्मा का गुस्सा भी फूट पड़ता था, धमकाते हुए कहती थीं कि आने दो तुम्हारे बाबू को ,सब बताती हूँ उन्हे ,कि कितना पढ़ाई में मन लगा रहे हो। इस पर उन्हें मनाने का प्रयास करता ,उनके पैर भी दबाता …. आखिर माँ तो माँ ही होती है,मान भी जाती थीं ।
   मित्रों की सूची में बिहार , मध्य प्रदेश, राजस्थान, पश्चिम बंगाल आदि के साथ-साथ हंगरी नेपाल के भी मित्र होते थे। लेकिन कुछ ही मित्रों से अधिक दिनों क्या,सालों  तक पत्रव्यवहार भी चला । काफी घनिष्ठता भी हो गई । मेरी एक मित्र पटना से थीं, किस पत्रिका के माध्यम से दोस्ती हुई थी पता नहीं ,लेकिन इतना याद है कि सन 1978 में दोस्ती हुई थी जो सन 1986 तक चली,उसके बाद नौकरी में जो लगा तो सब कुछ इधर -उधर हो गया । वैसे इस दोस्ती को परिवार के अधिकांश लोग जानते भी थे, रह-रह कर मज़ाक भी उढ़ाया करते । मेरे एक मामा -मामी थीं (जो अब इस दुनिया में नहीं हैं), वह अक्सर अम्मा से कहती कि जिया  (अम्मा को) इसका (मेरा नाम लेकर)  ब्याह उस पटना वाली से क्यों नहीं कर देतीं ।इस पर अम्मा बड़े गर्व से कहतीं कि वहीं होगा ,जहां मैं चाहूंगी। इसका एक कारण भी था कि अम्मा के विश्वास को ठेस नहीं पहुंचाना चाहता था । उसके पीछे भी कई कारण थे,जिसका उल्लेख नहीं कर सकता । बातों -बातों में मैंने अम्मा से कह रखा था कि आप जहां चाहोगी वहीं करूंगा । इस बात को मैं ने गर्व के साथ निभाया भी। इसके अलावा अपनी दोनों बहनों एवं छोटे भाई को अधिकार दे दिया था कि आप लोग जहां चाहो कर देना । हुआ भी वही 1986 में बनारस से प्रकाशित हिन्दी दैनिक आज से नौकरी शुरू की । नौकरी के चक्कर में , युवा मन था उछल-कूद मचाते हुए कई प्रदेशों में काम  किया। उधर व्यस्तता के चलते पत्र व्यवहार में दूरिया बढ़ती गईं । लगभग समाप्त सी हो गई। यहाँ पर एक बात और बताता चलूँ कि 1992 के शुरुवात में जब मेरी इंगेजमेंट हुई तो मैं उस समय गुरुग्राम (तब वह गुड़गाव कहलाता था।)में जनसंदेश अखबार में कार्यरत था । यह जानकारी तो मुझे तब पता चली जब में 26 जनवरी के अवकाश में घर पहुंचा ।तो इस बात को बताया गया कि तुमहार शादी तय कर दी है , 27 फरवरी को होना निश्चित हुआ है ।  इस साहस के लिए मैं अपनी पत्नी के आत्म संबल का भी दाद देता हूँ, जिन्हों ने बिना मुझे देखे अपनी स्वीकृति दे दी थी, आज का समय होता तो शायद यह संभव ही नहीं होता । लगता है शायद बहक रहा हूँ …
   हाँ तो बात पटना वाली मित्र की कर रहा था , इसके पीछे भी एक मज़ेदार घटना मेरे साथ घटी ,जिसका उल्लेख भी जरूरी समझता हूँ। पत्रव्यवहार के सिलसिले को लगभग पाँच साल तो हो ही गाये थे, इधर बनारस में ही बी ए तथा एम ए भी कर चुका था, अब बच्चा तो रहा नहीं , बड़ा हो चुका था। नौकरी की तलाश शुरू हो चुकी थी, बाबू (पिता जी ) चाहते थे कि सरकारी नौकरी में जाऊँ । उसके लिए रेलवे ,बैंक के साथ-साथ प्रदेश की अधीनस्थ सेवाओं की भी परीक्षाएँ देने लगा । उसी दौरान बिहार संघ लोक सेवा आयोग का फार्म भरा , सेंटर पड़ा बिहार शरीफ (नालंदा जिला का मुख्यालय)। तब तो फोन आदि हुआ नहीं करते थे ,पत्र द्वारा मित्र को सूचित किया कि फलां तारीख को पटना आ रहा हूँ ,वहाँ से बिहार शरीफ जाना है, सप्ताह भर बाद उत्तर आया कि प्रदीप जाते समय कुछ समय के लिए घर भी आओ ,सभी लोग मिलना चाहते हैं । अब तारीख तो याद नहीं है ,लेकिन निर्धारित दिन पटना पहुंचा। पहली बार फ़ैज़ाबाद/बनारस के बाहर निकाला था, यात्रा भी अकेले की थी। खैर साहब पटना पहुंचा , सामान स्टेशन के रिटायरिंग रूम में जमा किया। और निकल पड़ा मित्र से मिलने गंतव्य की ओर । रिक्शे वाले से बात की ,वह लेकर चल पड़ा । पता पूछते-पूछते कदम कुआं पहुंचा। जो पता मेरे मित्र का था उसी से मिलता जुलता पता स्व फणीश्वर नाथ रेणु जी का भी था, उनका निधन काफी पहले हो चुका था। उस घर में उनकी दूसरी पत्नी लतिका रेणु जी रहती थीं। दोपहर का समय था, रिक्शा वाले ने कहा कि यही मकान है । मैं रिक्शे से उतर कर वहाँ पहुँच और दरवाजा खटकाया , थोड़ी देर में सफ़ेद खद्दर की धोती में एक महिला निकली , जिनसे मैं ने मित्र के परिवार के बारे में जानकारी जाननी चाही तो उन्हों ने पता देख कर कहा कि यह यहाँ का नहीं है , तुम राजेन्द्र नगर चले जाओ, वहाँ पर रोड नंबर आठ पूछ लेना ,बता देंगे ,जिनका पता यह है वह पटना यूनिवर्सिटी में होते थे …….. । में वापस होने के लिए मुड़ा ही था कि लतिका जी ने कहा रुको, इतनी धूप में आए हो, ठंडा पानी पी कर जाओ। में ने एक गिलास पानी पीया और मित्र के घर की ओर रवाना हो गया । (इस बात का उल्लेख इस लिए कर रहा हूँ कि इस वर्ष स्व फणीश्वर नाथ रेणु जी की जन्म शताब्दी मनाई जा रही हे।)
    सूरज देवता ठीक सर के ऊपर ,घर खोजते-खोजते गंतव्य तक पहुँच ही गया ,जहां मित्र के घर वाले इंतज़ार भी कर रहे थे । क्यों कि दोपहर का खाना भी बना रखा था। खैर साहब खाना खाया ,देर शाम तक परिवार वालों के साथ बातें भी होती रहीं। सुबह नालंदा में बीपीएससी की परीक्षा भी देनी थी। सो वहाँ से चल कर देर रात नालंदा पहुंचा । इस तरह से आना जाना बराबर बना रहा । हम लोग घनिष्ठ मित्र भी हो गए थे। उस समय कुछ ही शिक्षा संस्थानों में होम साइंस में स्नातक पाठ्यक्रम होते थे, उसने पटना महिला महाविद्यालय से होम साइंस में आनर्स ले लिया था । इधर बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय में भी होम साइंस में आनर्स था ही । किताबों की जरूरत होती तो मुझे पत्र से सूचित करती, मै बीएचयू से जुगाड़ (यही कहूँगा,क्यों कि वहाँ मेरे परिवार का तो कोई होम साइंस से पढ़ नहीं रहा था। मैं काशी विध्यापीठ  में छात्र राजनीति करता था) कर उसे उपलब्ध कराता । फिर भी समस्या यह थी कि पटना तक पहुंचाई कैसे जाय। कभी रजिस्टर्ड डाक से भेज देता,लेकिन वह बहुत महंगा पड़ता था उन दिनो ,ऊपर से बेरोजगार तो था ही ,नौकरी खोजी ही जा रही थी। बाबू के पास भी तो इतना नहीं था कि जेब खर्च के नाम पर कुछ मिलता रहा हो। मित्र थी तो किताबें पहुचना भी था । काशी विध्यापीठ (जिसके आगे अब महात्मा गांधी जी का नाम जोड़ दिया गया है।) मेरे एक सहपाठी थे , जिनके पिता जी उन दिनों पटना के सर्वोच्च पुलिस अधिकारी थे । वह या उसके परिवार के लोग अक्सर आया-जाया करते थे , जिनके माध्यम से बाद में भेजने लगा । लेकिन इसके बदले में वह मित्र बराबर हर साल एक स्वेटर बीन कर भेजती रही ,  जिसे मैं चाव के साथ पहनता भी था। फिर तो यह सिलसिला चलता ही रहा । मित्र की बड़ी बहन की शादी का निमंत्रण आया तो उसमे भी में शामिल हुआ। उसके साथ अंतिम मुलाक़ात मेरी तब हुई थी जब 1989 में मैं गुवाहाटी के एक दैनिक अखबार को छोड़ कर पटना होते हुए दिल्ली दूसरे अखबार में जा रहा था। स्टेशन पर उसके साथ भाई,बहन सभी मिलने आए थे,यहाँ तक कि रास्ते का खाना भी दिया था ,क्यों कि ट्रेन दूसरे दिन सुबह दिल्ली पहुचने वाली थी। बस वही अंतिम मुलाक़ात कही जा सकती है। क्यों कि उसके बाद में अपने घर गृहस्थी में मसगूल हो गया , और वह अपने । मुलाक़ात तो नहीं हुई पर वह आज कल बिहार के एक यूनिवर्सिटी में किसी विभाग में विभागाध्यक्ष हैं । संभवत: एक-दो साल में रिटायरमेंट भी हो।
      इसी तरह मेरे एक पत्र मित्र थे जयपुर के । जिनके हाथ की कला देखते बनती थी, वह हर पत्र के साथ एक भवन का स्केच बना कर भेजते । सच बोलूँ गज़ब का होता था वह स्केच । आज अगर वह सम्हाल कर रखा होता तो आलीशान भवन बनवाने वाले को जरूर दे देता। लेकिन समय के आगे किसी की नहीं चली न। काफी दिनो तक पत्रव्यवहार चलता रह,बाद में वह भी बंद हो गया । एक नेपाली मित्र थे,  बिनदेशवर प्रसाद गुप्ता जी। सुनसारी नेपाल के थे , अक्सर बुलाया करते कि आइये घूम जाइए, तब नेपाल मुझे लंदन लगता था। कल ही एक फाईल में उनकी विजय दशमी की शुभकामनाओं की ग्रीटिंग मिल गई। यह बात सन 1978 की है । उनका पता मिला है कोशिश करूंगा उनके बारे में पता करने का । मध्य प्रदेश के इंदौर से एक मित्र थीं ,जिनके मामा का बनारस में काफी बड़ा होटल भी है । काफी दिनों तक पत्राचार चलता रहा ,बाद में वह भी खत्म सा हो गया । हाँ एक मित्र का जिक्र जरूर करना चाहूँगा जो हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट से थी , नाम था ब्राजीटा । ब्राजीटा से लगभग पाँच-छह साल तक पत्राचार होता रहा । तब वह देश कितना विकसित रहा होगा यह में आज भी सोचता हूँ। जिस कागज़ पर उसका पत्र होता था ,वह इतना महीन कि लगता था कहीं फट न जाए। लेकिन साहब कितना मजबूत कागज़ होता था ,मैं कह नहीं सकता। उस पर से लिखाई इतनी गजब कि की पूछिये मत। तब वह अक्सर कुछ न कुछ पत्र में भेजती रहती थी । मसलन नेम प्लेट आदि। इतना महीन की क्या बताऊँ , काफी दिनों तक था वह मेरे पास।
   अब जाने दीजिये जनाब ,आप भी बोर हो रहें होंगे । पर इतना तो मानना ही होगा कि वह दोस्ती वास्तव में दोस्ती होती थी जिसमे किसी प्रकार का स्वार्थ नहीं होता था । जिसे निःसन्देह मित्रता कही जा सकती है । अगली बार कुछ और अनुभवों के साथ।

काशी का ‘नाच घर’: जहां खेला गया था हिन्दी का पहला नाटक

काशी के नाचघर की परिकल्पना चित्रकार द्वारा
जानकी मंगल में लक्ष्मण बने थे भारतेन्दु हरिश्चंद्र















                                                   डॉ प्रदीप श्रीवास्तव
आज 3 अप्रैल है ,हिन्दी रंगमंच की दुनिया का स्वर्णिम दिन। आज के ही दिन आज से 152 साल पहले साहित्य एवं शिक्षा की नगरी काशी ,जिसे आज वाराणसी और बनारस के नाम से भी जानते है । जहां पर पहला हिन्दी नाटक खेला गया था। इस लिए आज की तारीख केवल एक तिथि भर ही नहीं है बल्कि आज के दिन को हिन्दी रंगमंच दिवस के रूप में भी जाना जाता है । चैत्र शुक्ल 11,सं 1925 अर्थात 3 अप्रैल 1868 को पंडित शीतला प्रसाद त्रिपाठी जी के लिखे नाटक “जानकी मंगल” को वाराणसी में अंग्रेज शासकों के ‘एसेम्बली रूम्स एंड थियेटर’ या यूं कहें “नाच घर” (जिसे आज बंगला नंबर 25A/B के नाम से जाना जाता है ।) में खेला गया था । इस दिन की दूसरी विशेषता यह भी है की इस नाटक में लक्ष्मण की भूमिका स्वयं भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने अदा की थी ।
मिले दस्तावेजों के मुताबिक 3 अप्रैल सन् 1868 को पं. शीतला प्रसाद त्रिपाठी रचित ‘जानकी मंगल’ नाटक का अभिनय ‘बनारस थियेटर’ में आयोजित किया था। कहते हैं कि जिस लड़के को लक्ष्मण का अभिनय पार्ट करना था वह अचानक उस दिन बीमार पड़ गया ।तब लक्ष्मण के अभिनय की समस्या पैदा हो गई। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि यदि उस दिन  भारतेन्दु हरिश्चंद्र  स्थिति को न सँभालते तो नाट्यायोजन स्थगित करना पड़ता। भारतेन्दु जी ने एक-डेढ़ घंटे में ही न केवल लक्ष्मण की अपनी भूमिका याद कर ली अपितु पूरे ‘जानकी मंगल’ नाटक को ही मस्तिष्क में जमा लिया । केवल इतना ही नहीं  भारतेन्दु जी ने अपने अभिजात्य की परवाह नहीं की। पता हो कि उन दिनों उच्च कुल के लोग अभिनय करना अपनी प्रतिष्ठा के अनुकूल नहीं समझते थे। इस प्रकार इस नाटक से भारतेन्दु ने रंगमंच पर सक्रिय भाग लेना आरम्भ किया। इसी समय-उन्होंने नाट्य-सृजन भी आरम्भ किया। उस समय इंग्लैंड के एलिन इंडियन मेल के 8 मई 1868 के अंक में उस नाटक के मंचन की जानकारी भी प्रकाशित की गई थी । प्रथम अभिनय के विवरण का उल्लेख आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ में भी किया है । इसी  आधार पर डा.शरद नागर ने ब्रिटिश म्यूजियम,लन्दन से ‘एलेन्स इन्डियन मेल’ के उक्त समाचार की प्रतिलिपि मंगायी और ‘धर्मयुग’ में प्रकाशित अपने लेख में इस तिथि की पुष्टि की .इसे प्रमाण मान कर 1968 में नागरी प्रचारिणी सभा,काशी  तथा हिंदी क्षेत्र की सांस्कृतिक-साहित्यिक संस्थाओं ने हिंदी रंगमंच की शतवार्षिकी मनायी .यह बात अलग है कि  हिंदी की बोलियों में लोकनाट्य की परंपरा बहुत पुरानी है. वहीं दूसरी अहम बात यह भी है कि जहां पर इस नाटक को  खेला गया था उस जगह की खोज काशी के वरिष्ठ रंगकर्मी  स्व डॉ कुँवर जी अग्रवाल ने की थी । इस लिए इसे ही प्रमाणित तिथि मानकर ही इस दिन को हिन्दी रंग दिवस के रूप में स्वीकारते हुए 1968 में :”हिन्दी रंग दिवस  शताब्दी “वर्ष मनाया गया था ।
लेकिन दूसरी तरफ कुछ लोग इस मामले पर हस्तक्षेप करते हुए यह भी कह रहे हैं कि सन 1533 में नेपाल के भाटगाँव में “विद्याविलाप “ नमक हिन्दी नाटक खेला गया था। जबकि  कुछ लोगों का यह भी कहना हे कि  सन 1850 से 1860 के बीच लखनऊ में “इंद्रसभा” और नवाब वाजिद अलीशाह के “किस्सा राधा कन्हैया” का मंचन हुआ था। बताते हैं कि उन्हीं  दिनों मुंबई (तब बंबई कहा जाता था)में सांगलीकर नाटक मंडली ने “ गोपीचंदो पाख्यान “ (ओपेरा) का मंचन किया था । बात जो भी हो इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि हिन्दी रंग मंच की शुरुआत काशी(वाराणसी) से हुई थी। यहीं पर शीतला प्रसाद त्रिपाठी और भारतेन्दु हरिश्चंद्र जैसे रंगकर्मी और नाटककार हुए ।  इसी  काशी की भूमि पर “अंधेरनगरी” एवं “जनकीमंगल” जैसे नाटक लिखे गए।   
‘एसेम्बली रूम्स एंड थियेटर’ अर्थात नाचघर वाराणसी शहर से लगभग छह किलोमीटर की दूरी पर है । जी छावनी एरिया के अंतर्गत आता है । उस जगह को बाद में ‘बनारस थियेटर ‘ नाम दिया गया था । उसी  बनारस थियेटर के बंगला नंबर 25 ए/बी में अब काफी कुछ बदलाव हो चुका है । 80 के दशक तक इस भवन को निजी तोर पर इस्तेमाल किया जा रहा था ,बाद में 90 के दशक में नलकूप विभाग का कार्यालय बना दिया गया । बताते हें कि आजकल एक कालीन निर्माता के आयात-निर्यात का शोरूम बन गया है ।
एक नज़र नाचघर पर :
1868 में जिस जगह पर पहला हिन्दी नाटक घर खेला गया था, वह अंग्रेजों का नाच घर हुआ करता था ,जहां सूरज ढलते ही वे अपनी बीबियों के कमर में हाथ डाले नाचा करते थे। बताते हें की इस इमारत का निर्माण 1814 में हुआ था जो भारत में ब्रिटिश वास्तु कला का दूसरा प्रतीक था । पहला कोलकता के चौरेंगी लेन स्थित नाचघर थियेटर था। काशी के नाच घर की ऊंचाई 32 फीट थी,जिसमें सैकड़ों लोग एक साथ बैठ कर मनोरंजन का आनंद लेते थे। हाल से लगा उनका टेनिस कोर्ट था ,जहां पर अन्य गतिविधियां होती रहती थीं । दस्तावेजों के मुताबिक इस नाचघर में 1890 तक नाटकों का मंचन हुआ करता था।उसके बाद एक नीलामी में वर्तमान दावेदार ब्रज कुमार दास के बाबा जिनका  भी नाम ब्रज कुमार दास ही था ,ने ले लिया था । काशी के रंगकर्मियों ,रचनाकारों को चाहिए कि सरकार से इस ऐतिहासिक धरोहर को बचाने का प्रयास करें । नहीं तो आने वाले दिनों में यह भी इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगा ।
वाराणसी में नाटक और मैं :-
मैं ने कभी नाटक तो नहीं खेला ,लेकिन करवाया बहुत , वह भी ऐतिहासिक रूप में । सन 1976 से 1986 तक वाराणसी में शिक्षा के दौरान साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं से काफी जुड़ा हुआ था , जिनकी विभिन्न गतिविधियों में भाग लेता था । इस दस साल के दौरान दो ऐतिहासिक नाटक वाराणसी में खेले गए । एक था जय शंकर प्रसाद जी की “गुंडा”,एवं दूसरा था विजय तेंदुलकर साहब की चर्चित नाटक”बेबी”।
पहले गुंडा की चर्चा : स्वतन्त्रता आंदोलन पर आधारित “गुंडा” नाटक की पृष्ठभूमि वाराणसी के आस-पास की है, जो  उस समय के नामी गुंडा नन्हकू सिंह के देश भक्ति पर आधारित थी । जिसक निर्देशन किया था उस समय के ख्यातिप्राप्त रंगकर्मी राम सिंह आज़ाद ने । कलाकारों में थे गोपाल जी ,अमरनाथ शर्मा ,सुरेन्द्र झा ,अरुण शर्मा ,विनय पाठक एवं एक मात्र महिला नेत्री थीं उस समय की सर्वाधिक लोकप्रिय भोजपुरी अभिनेत्री मधु मिश्रा। यह नाटक 1982 के जुलाई माह के प्रथम  सप्ताह में नगरी नाटक मंडली में खेला गया था । संस्था थी वसुंधरा ,जिसका मै मंत्री हुआ करता था। बताते हैं कि 1982 के बाद दोबारा इस नाटक का मंचन नहीं हुआ।
बात तेंदुलकर के “बेबी” नाटक की :
बात 1983 की है ,वाराणसी की एक साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था थी “आईना’’ । आईना ने प्रतिष्ठित रंगकर्मी विजय तेंदुलकर के सर्वाधिक विवादित नाटक ‘बेबी’ के मंचन का बीड़ा उठाया । महीनों रिहर्सल हुए , वाराणसी के नगरी नाटक मंडली को खेलने के लिए बुक भी कर लिया गया । नाटक का निर्देशन कर रहे थे युवा निर्देशक जितेंद्र मुग्ध । सारी तैयारियाँ पूरी हो चुकी थी ,बस चार दिन बाद नाटक का मंचन होना था तभी नाट्यकर्मियों को धमकियाँ मिलनी शुरू हो गईं कि मंचन रोक दो नहीं तो हम लोग नाटक की अभिनेत्री का अपहरण कर लेंगे और नाटक नहीं होने देंगे। क्यों कि नाटक में कई दृश्य आपत्तिजनक भी थे। खैर ,आयोजक मेरे पास आए और पूरी बात बताई । उन दिनों में काशी विद्यापीठ की छात्र राजनीति में सक्रिय भी था। मैने उन्हें आश्वासन दिया कि नाटक होगा। मेरे सामने भी एक खुली चुनौती थी कि कैसे इसको करवाया जाय । अचानक दिमाग में एक विचार आया ,और आयोजकों से कहा कि एक कम करो आप लोग। सेना के सबसे वरिष्ठ अधिकारी को मुखय अतिथि बनाओ । उन्होने ने बात मान  भी ली और सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी को निमंत्रित भी कर दिया । निमंत्रण पत्र पर उनका नाम भी छाप गया ,साथ ही यह निर्देश भी की बिना निमंत्रण प्रवेश नहीं होगा। उधर नाटक वाले दिन उन अधिकारी महोदय से मिलकर सारी जानकारी दे दी थी और उनसे आग्रह किया था कि आप आने से थोड़ा पहले अपने जवानो को भेज दें ,जिससे वे केवल गेट पर खड़े हो जाएंगे । हुआ भी वही , सेना के जवानों को गेट पर देख कर बिना निमंत्रण वालों को प्रवेश नहीं मिला। समय पर सफलता के साथ नाटक का मंचन हो गया। कहीं कोई रुकावट नहीं आई। नाटक के कलाकार थे अतुल कुमार माला,गोपाल आदि। ये दो नाटक ऐसे थे जिसका मंचन (मेरी जानकारी मै) आज तक वाराणसी में नहीं हुआ । 

मंगलवार, 16 अगस्त 2016

जलमय हुआ लखनऊ शहर

किसी फिल्म का एक गाना है 'बरखा रानी जम कर बरसो ',सच लखनऊ में मंगलवार की दोपहर से जम  कर पानी बरस रहा  हैं .इतना बरस रहा है कि शहर की चिकनी चुपड़ी सड़कें तरबतर हो रही हैं ,जहाँ बरसात  के इस पानी से आम जन जीवन प्रभावित हो गया है ,वहीँ  प्रदेश सरकार  के विकास  कार्यों की कलई भी खुलती जा रही है.. तीन दिन पहले तक चारों  तरफ हाय हल्ला मच रहा था कि देखो देश के  कितने हिस्सों में बाढ़ आई है ,एक अपना लखनऊ है कि एक-एक बूंद पानी के लिए तरास  रहा है. लो साहब अब तरसने की बात छोड़ो अपने को सहेजने की बात करो भाई .
 बूंदा-बाँदी तो रविवार  की शाम से ही शुरू हो गई थी  ,उस दिन गोधुल बेला में जमकर पानी भी बरसा, सोमवार  को एक ओर सारा शहर स्वतंत्रता दिवस की 70 वर्षगांठ मना रहा था ,वहीँ इंद्र देवता भी प्रसन्न हो कर हलकी बूंदा बाँदी कर रहे थे .लोग सुहाने मौसम के बीच ,छुट्टी का दिन होने के कारण अपने लोगों के साथ पिकनिक मना रहे थे. लेकिन अचानक मंगलवार की दोपहर बाद इंद्र देवता शायद  इतना खुश  हुए या फिर  क्रोधित की जो पानी बरसना शुरू हुआ तो लगातार  तीन घंटे तक मुसलाधार बरसते रहे ,जिसके चलते सारा शहर  अस्त-व्यस्त हो गया ,जो जहाँ था वहीँ थम गया .शहर के हर हिस्से में पानी का जमाव लग गया ,जब शाम को लगभग 7.30 बजे बूंदा बाँदी ख़त्म हुई तो लोग बाग अपने घरों के लिए निकल पड़े ,अरे यह क्या ? जगह- जगह दो से तीन फीट तक पानी का जमाव ,महिलाये क्या, पुरुष  क्या ,सभी के दो चक्का वाहन  पानी में डूबने जैसा हो गए. कुछ के वहां तो पानी में ही बंद भी हो गये ,वहीँ दूसरी तरफ जमाव के बीच चार पहिया वाहन  वाले भी मस्ती करते दिखे ,हुआ यूँ कि सड़क पर खड़े पानी के बीच तेज गति से वे अपने वहां लेकर गुजरते, जिसके चलते बरसाती पानी के तेज छीटों से अगल-बगल वाले तो पूरी तरह भीग गए .इंद्रा नगर, गाँधी पुरम, आम्रपाली का क्षेत्र रहा हो या अलीगंज ,विकासनगर ,राम-राम बैक का एरिया ,सभी जगह चारों ओर पानी ही पानी ,मानो  गोमती नदी लखनऊ  की सड़कों पर बहने लगीं हों.विश्व प्रसिद्ध रूमी दरवाजा व बड़ा इमामबाडा के पास देखते ही बन रहा था ,दोनों तरफ सड़के पानी में डूबीं हुई  थीं.
सबसे बुरा हाल तो रिंग रोड पर बसे जानकीपुरम क्षेत्र का था ,जहाँ जाने की लिए कोई भी ऐसा मार्ग नहीं था जो जल जमाव से भरा न रहा हो.लोग  देर रत तक रिंगरोड पर अपने वाहनों को खड़े कर पानी खत्म होने का इंतजार करते रहे .सहारा इस्टेट , आकांक्षा परिसर ,साठ फीट रोड ,प्रभात चौराहा का  दृश्य तो देखने वाला था .
कुल मिला कर पानी जमाव के पीछे सरकारी तंत्र का ही दोष दिया जायेगा . अरे भाई इतने बड़े शहर में इतनी बड़ी आबादी वाले क्षेत्र में सरकार  पानी निकासी के लिए जब छह इंच व्यास का पाईप लगवायेगी, तो इसका कोप भजन तो आम जनता को ही तो बनना पड़ेगा न. यह तो हर साल का रोना है ,आप रोते रहिये , सर्कार  व उसके नुमाइंनदे  सोते रहेंगे, आप की बला से .सत्रह अगस्त की देर सुबह तक बरसात जारी  थी . देखिये क्या होता है अगर आज दिनभर भी यही हाल  रहा . साथ में एक वीडियो संलग्न है ,उसे देख कर आप मुसलाधार बारिस का अंदाज लगा सकते हैं , जिसे हिंदी मासिक 'दिव्यता' के कार्यालय परिसर ,गोयल पैलेस ,फैजाबाद रोड पर लिया गया है .

सोमवार, 15 अगस्त 2016

झाड़ू और हम
सच में अब झाड़ू का महत्व समझ में आया है . वह भी पांच दशक के बाद.अब आप कहेंगे कि वह भी इतने दिनों बाद, कैसे समझ में आया ? आज दोपहर मे छोटे परदे पर बच्चों के साथ एक फिलिम देख रहा था ,तभी एक झाड़ू बनाने वाली कंपनी का विज्ञापन देखा, किस तरह महिलाएं झाड़ू के गुणों का बखान कर खरीदने का आह्वान कर रही थी .विज्ञापन को देखने के बाद प्रधान मंत्री जी का मन ही मन आभार व्यक्त करने लगा , अगर वह झाड़ू अपने हाथ में न लेते, तो इस घर सफाई के प्राचीन यंत्र पर लोगों की कृपादृष्टि नहीं पड़ती, लोग एक वर्ग विशेष तक का ही वर्चस्व उस पर समझते.
आप कह रहें होंगे यह भी कोई बात हुई, सही भी है. याद कीजिये केवल दो दशक पहले वाले लोगों से ही पूछिए ,जब उनके घर वाले उनसे कहते की जाओ बाज़ार से झाड़ू लेते आओ ,या घर आते समय लेते आना,तो उन जनाब (हम -आप सभी ) को कितना बुरा लगता था. हूँ में झाड़ू लेकर आऊंगा ,लोग क्या कहेंगे. आज मुझे याद आ रहा है,जब हम छोटे थे तो अम्मा अक्सर कहती थी की जाओ फलां की दुकान से झाड़ू लेते आओ, तो हम कितना बहाना बनाते कि मुझे न लाना पड़े ,कोशिश होती की छोटा भाई ले आये, लेकिन वह भी हमसे दो हाथ आगे ...,कह देता की हम कैसे लायेंगे इतना बड़ा झाड़ू .कुल ले दे कर झाड़ू लाने का जिम्मा मेरे ऊपर ही पड़ता. घर में बीच (मझौला) का होने के कारण लाना ही मुझे पड़ता.जब सूर्य देवता पश्चिम की ओर विदा लेते ,तब हम झाड़ू लेने का मन बनाते. अकेले ही बाज़ार निकल पड़ते, दोस्तों तक को साथ नहीं लेते ,किराना की दुकान से झाड़ू लेने. के मोलभाव का कोई सवाल नहीं ,जितने में दिया ले लिया ,अम्मा पहले ही बता देतीं थी कि इतने में मिलेगा. लीजिये साहब अब हम झाड़ू लिए और दोनों हाथों से पकड कर पीछे पीठ से लगाकर घर की ओर चल देते ,कोशिश करते कि मोहल्ले का कोई देख न ले कि में झाड़ू लेकर जा रहा हूँ .खुदा न खस्ता बाज़ार से घर के रस्ते में कोई न कोई जरुर मिल जाता ,पहले तो वह मुझे देखता ,फिर मेरे आगे पीछे देखता .हाथ में झाड़ू देखते ही बोल जरुर देता ,का मियां हाथ में का लिए हो ? झाड़ू ,वह कहाँ सफाई करने जा रहे हो .बस इतना सुनते ही गुस्सा फूट पड़ता,कमजोर हुआ तो एकाद -दो खा जाता , अगर वह सवासेर निकला तो अपनी ख़ैर नहीं. मानो पानीपत के युद्ध से लौटा हूँ.
ख़ैर जनाब ,आज के समय में झाड़ू का महत्व कही बढ़ गया है ,लोगबाग अपने हाथों में झाड़ू लिए फोटो खिचवा रहें ,यही नहीं झाड़ू के साथ सेल्फी भी लेने से हिचकिचाते नहीं. यह प्रधानमंत्री की दूरदृष्टि का ही तो नतीजा है कि झाड़ू अब हेय की चीज नहीं शान की चीज हो गई है , तभी तो झाड़ू बनाने वाली कम्पनियां अपना ब्रांड बना कर बेच रही हैं .कहाँ पहले दो-तीन रुपल्ली में मिलने वाला झाड़ू आज सौ से डेढ़ सौ रूपये मिल रहा है .

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

मित्रता -1

मित्रता के बदलते आयाम
कल रात मेरी एक टैग मित्राणी (दोस्त ) ने रोमानिया से एक कार्टून भेजा है ,जिसमे दो उम्र दराज लोगों को नेट सर्फिंग करते हुए दिखाया है | मजे क़ी बात यह है कि दोनों लोग ही यह सोच कर सर्फिंग कर रहे हैं कि वे नेट पर किसी युवा के साथ चैटिंग कर रहे हैं,पर दोनों लोग हैं बुजुर्ग |इस कार्टून को देखने के बाद मेर जेहन में एक बात आई कि आज बदलती टेक्नालोजी के इस दौर में हमारी मानसिकता भी कितनी बदल रही है |हम आज भी अपने को युवा देखने क़ी चाह में अपने  सारे बन्धनों को तोड़ने पर विवश हो रहे हैं क्यों? मित्रता करना कोई गलत बात नहीं है,लेकिन आज के दौर में इसी मित्रता को पैसा कमाने का जरिया भी बना लिया गया है ,कल क़ी ही बात है मुंबई में पुलिस ने एक ऐसे परिवार को धर दबोचा है जो मित्रता के नाम पर देह व्यापार के धंधे  में लिप्त  था यह परिवार लोगों को दोस्त बनाए के नाम पर देह वयापार को करता ही था वहीँ उनसे भारी मात्रा ऍन पैसा भी वसूलता था|जिसके लिये अखबारों में बाकायदा दोस्त बनिए जैसे  आकर्षक शीर्षक से विज्ञापन भी देता था,जिसके मध्यम से लोग उनके जाल में फंस जाते ||अंतर्जाल के इस मकड़ जाल पर (इटरनेट ) दोस्ती क़ी कितनी साइटें हैं,जिनकी कोई संख्या तक नहीं है,लेकिन क्या उसके मध्यम से आज हम स्वस्थ दोस्ती क़ी परिकल्पना भी  कर सकते हैं, में तो कहूँगा कि कदापि नहीं |अब आप फेसबुक क़ी बात करें या फिर ट्विटर कि ,कहीं पर मुझे स्वस्थ मित्रता क़ी झलक तक नहीं दिखाई देती है |दुनिया भर में सर्वाधिक लोकप्रिय ये दोनों साईटें जरुर लोगों को एक दूसरे से जोड़ने काम करती होंगी ,लेकिन मित्रता का काम तो नहीं करती हैं, सूचनाओं का आदान- प्रदान जरुर कराती हैं | इसके अलावा बहुत सी साइटें तो  ऐसी हैं जिनका  हम सार्वजानिक रूप से उल्लेख भी नहीं कर सकते हैं| क्यों कि उन पर परोसी जाने वाली सामग्रियां ऐसी होती हैं,जिन्हें हम किसी को भी नहीं बता सकते हैं |कुछ तो ऐसी साइटें हैं जिन पर अश्लीलता क़ी भरमार है|गत तीन चार सालों से  नेट पर सर्फिंग करते -करते में ने ये देखा है क़ी दोस्ती के नाम पर लोग अपने नाम के साथ-साथ लिंग तक बदल रखें हैं, इनमे युवकों के अलावा युवतियां भी काम पीछे नहीं है ,या अगर में कहूँ क़ी उनकी संख्या युवकों से कहीं अधिक है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी | देर रात आप किसी भी साईट पर किलिक करें तो देखेंगे कि हरे सिग्नल  क़ी लाइट महिलाओं पर अधिक होगी | वे बातें भी खुल कर करतीं है,उनमे जरा सी भी शर्म व हया नाम क़ी चीज नहीं दिखाई देती है|

सोमवार, 12 दिसंबर 2011

अयोध्या में है विश्व क़ी सबसे लम्बी कब्र
आप ने भगवान श्री राम क़ी जन्म भूमि अयोध्या के बारे में काफी कुछ सुना होगा,वहाँ गए भी होंगे ,मंदिर एवम घाटों के दर्शन भी किये होंगे |लेकिन आप को क्या मालूम है कि उसी अयोध्या में विश्व क़ी अनोखी कब्र भी है जिसकी लम्बाई लगभग नौ गज है | चौंक पड़े न ,लेकिन सही है | वैसे तो कब्रे व मजारें तो दुनिया भर में हैं,लेकिन यह कब्र उच्च अनोखी है | जिसे हजरत - नुह - अल - ए- इस्लाम क़ी बताई जाती है | लेकिन इतिहासकरों में भी इस बात को लेकर मतभेद हे | कुछ इतिहासकरों ने नुह - अल - ए- इस्लाम साहब को गंजे शहीद  मना है |कहते हैं कि मोहम्मद साहब के 19 वीं पीढ़ी के नुह - अल - ए- इस्लाम साहब एक बार अपनी किश्ती से कहीं जा रहे थे .जब वे अयोध्या के पास पहुंचे ही थे कि अचानक भिसन तूफान आ गया |जिसकी चपेट में आ कर उनकी किश्ती (नव )के आठ तुकडे हो गए |जिसे वही जमीन में गाड दिया गया | जिसे आज नुह - अल - ए- इस्लाम क़ी कब्र के रूप में बताया जाता है | वहीँ कुछ अन्य इतिहासकरों कि धरना यह है कि आज से लगभग छह हजार साल पहले क़ी यह कब्र काफी पुरानी है जो उन्ही की है |उन्हें मानने वालों का कहना है की यह कबर उन्ही क़ी है,जो उस समय औसत आकार क़ी रही होगी |लेकिन छह हजार वर्ष का समय काम नहीं होता है,इस लिये कब्र क़ी मिटटी फैलाते -फैलाते फैल गई होगी |जो आज नौ गज क़ी हो गई है | इस नौ गज क़ी कब्र का इतिहास कुछ भी हो ,लेकिन आज भी इसे दुनिया क़ी सबसे लम्बी  कब्र का दर्जा हासिल हे |लेकिन जिला प्रशासन एवम पर्यटन विभाग की लापरवाही के चलते आज इसका कोई पुरसा हाल नही है |कब्र के आस-पास गन्दगी का ढेर पड़ा रहता है | नुह - अल - ए- इस्लाम साहब क़ी यह कब्र जब आप अयोध्या के मुख्य मार्ग पर हनुमानगढ़ी से थोडा आगे तुलसी पार्क क़ी ओर चलेंगे तो आप को दायें तरफ एक महल दिखाई देगा, जो राजा साहेब अयोध्या का है | इससे और आगे चलाने पर इसी हाथ आप को अयोध्या कोतवाली  दिखाई देगा | अयोध्या कोतवाली से ही बाएं तरफ कुछ दुकाने हैं,कोतवाली एवम दुकानों के बीच एक संकरा सा रास्ता है,जो अमूमन दिखाई नहीं देता | क्यों की वहाँ पर अतिक्रमण जो होगया है |उस संकरे रास्ते में आप पच्चीस कदम चलेंगे कि आप को या बड़ा सा हाता (मैदान ) दिखाई देगा,जो जिसमे दस फीट चौड़ी  एवम पच्चीस फीट लम्बी एक कब्र दिखाई देगी| इसे ही नुह - अल - ए- इस्लाम साहब क़ी कब्र के रूप में जाना जाता है |आप जब भी अयोध्या जाएँ तो विश्व की इस लम्बी व अनोखी कब्र को देखना मत भूलिएगा |
प्रदीप श्रीवास्तव

रविवार, 11 दिसंबर 2011

राजधानी दिल्ली:हवाई जहाज से प्रदीप श्रीवास्तव द्वारा लिया गया चित्र 
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सौ साल की हुई दिल्ली 
किसी भी भारतीय को यह जानकर हैरानी होगी कि आज की नई दिल्ली किसी परंपरा के अनुसार अथवा स्वतंत्र भारत के राजनीतिक नेताओं की वजह से नहीं, बल्कि एक सौ साल (1911) पहले आयोजित तीसरे दिल्ली दरबार में ब्रिटेन के राजा किंग जॉर्ज पंचम की घोषणा के कारण देश की राजधानी बनी. इस दिल्ली दरबार की सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटना ब्रिटिश भारत की राजधानी के कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरण की घोषणा थी. 12 दिसंबर, 1911 में ब्रिटेन के राजा की घोषणा से पहले इस ऐतिहासिक तथ्य से अधिक लोग वाक़ि़फ नहीं थे. किंग जॉर्ज पंचम के राज्यारोहण का उत्सव मनाने और उन्हें भारत का सम्राट स्वीकारने के लिए दिल्ली में आयोजित दरबार में ब्रिटिश भारत के शासक, भारतीय राजकुमार, सामंत, सैनिक और अभिजात्य वर्ग के लोग बड़ी संख्या में एकत्र हुए थे. दरबार के अंतिम चरण में एक अचरज भरी घोषणा की गई. तत्कालीन वायसराय लॉर्ड हॉर्डिंग ने राजा के राज्यारोहण के अवसर पर प्रदत्त उपाधियों और भेंटों की घोषणा के बाद एक दस्तावेज़ सौंपा. अंग्रेज राजा ने वक्तव्य पढ़ते हुए राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने, पूर्व और पश्चिम बंगाल को दोबारा एक करने सहित अन्य प्रशासनिक परिवर्तनों की घोषणा की. दिल्ली वालों के लिए यह एक हैरतअंगेज फैसला था, जबकि इस घोषणा ने एक ही झटके में एक सूबे के शहर को एक साम्राज्य की राजधानी में बदल दिया, जबकि 1772 से ब्रिटिश भारत की राजधानी कलकत्ता थी.
 एक तरह से नई दिल्ली का अर्थ भारतीय उपमहाद्वीप के लिए एक साम्राज्यवादी राजधानी और एक सदी के लिए अंग्रेज हुक्मरानों के सपनों का साकार होना था, हालांकि इसके पूरा होने में 20 साल का व़क्त लगा. यह भी तब, जबकि राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने के साथ ही नई दिल्ली बनाने का फैसला लिया गया. इस तरह नई राजधानी केवल 16 साल के लिए अपनी भूमिका निभा सकी. नई दिल्ली में निर्माण कार्य 1931 में पूरा हुआ, जब सरकार इस नए शहर में स्थानांतरित हो गई. 13 फरवरी, 1931 को तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन ने नई दिल्ली का औपचारिक उद्घाटन किया.
लॉर्ड हॉर्डिंग लिखते हैं कि इस घोषणा से उपस्थित लोगों में आश्चर्यजनक रूप से गहरा मौन पसर गया और चंद सेकंड बाद करतल ध्वनि गूंज उठी. ऐसा होना स्वाभाविक था. अपने समृद्ध प्राचीन इतिहास के बावजूद जिस समय दिल्ली को राजधानी बनने का मौक़ा दिया गया, उस समय वह किसी भी लिहाज़ से एक प्रांतीय शहर से ज़्यादा नहीं थी. लॉर्ड कर्जन के बंगाल विभाजन की घोषणा (1903) के बाद से ही इसका विरोध कर रहे और एकीकरण की मांग को लेकर आंदोलनरत बंगालियों की तरह दिल्ली वालों ने कोई मांग नहीं रखी और न कोई आंदोलन छेड़ा. किंग जॉर्ज पंचम की घोषणा से हर कोई हैरान था, क्योंकि यह पूरी तरह गोपनीय रखी गई थी. उनकी भारत यात्रा के छह महीने पहले ही ब्रिटिश भारत की राजधानी के स्थानांतरण का निर्णय हो चुका था. इंग्लैंड और भारत में दर्जन भर व्यक्ति ही इससे वाक़ि़फ थे. राजा की घोषणा के समानांतर बांटे गए गजट और समाचार पत्रकों को भी पूरी गोपनीयता के साथ छापा गया. दिल्ली में एक प्रेस शिविर लगाया गया, जहां सचिवों, मुद्रकों और उनके नौकरों के लिए रहने की व्यवस्था की गई और वहीं प्रिटिंग मशीनें लगाई गईं. दरबार से पहले इन शिविरों में कर्मचारियों को लगा दिया गया और दरबार की वास्तविक तिथि से पहले इस स्थान की सुरक्षा को चाक चौबंद रखने के लिए सैनिकों-पुलिस की टुकड़ियां तैनात कर दी गई थीं. सात दिसंबर, 1911 को ब्रिटेन के राजा और रानी (जार्ज पंचम और क्वीन मेरी) दिल्ली पहुंचे. शाही दंपत्ति को एक जुलूस की शक्ल में शहर की गलियों से होते हुए विशेष रूप से लगाए गए शिविरों के शहर (किंग्सवे कैंप) में गाजे-बाजे के साथ पहुंचाया गया. उत्तर-पश्चिम दिल्ली में विशेष रूप से निर्मित एक सोपान मंडप में आयोजित दरबार में चार हज़ार ख़ास मेहमानों के बैठने की व्यवस्था की गई और एक वृहद अर्द्ध आकार के टीले से क़रीब 35,000 सैनिक और 70,000 दर्शक दरबार के चश्मदीद गवाह बने. दरबार के दौरान लॉर्ड हॉर्डिंग सहित काउंसिल के सदस्यों, भारतीय राजाओं, राजकुमारों सहित कइयों ने अंग्रेज राजा की कदमबोसी की और हाथ को चूमा. 25 गुणा 30 मील के घेरे में फैले क्षेत्र में 223 तंबू लगाए गए, जहां 60 मील की नई सड़कें बनाई गईं और क़रीब 30 मील लंबी रेलवे लाइन के लिए 24 स्टेशन.
अहमद अली के उपन्यास-टि्‌वलाइट इन दिल्ली (1940) के अनुसार, वायसराय लॉर्ड हार्डिंग ने व्यक्तिगत रूप से दरबार की तैयारियों का जायज़ा लिया. कुल 40 वर्ग किलोमीटर में फैले 16 वर्ग किलोमीटर के घेरे में पूरे भारत से क़रीब 84,000 यूरोपियों और भारतीयों को 233 शिविरों में ठहराया गया. 1911 में बसंत के मौसम के बाद क़रीब 20,000 मज़दूरों ने दिन-रात एक करके इन शिविरों को तैयार किया. इस दौरान 64 किलोमीटर की सड़कों का निर्माण हुआ, शिविरों में पानी की व्यवस्था के लिए 80 किलोमीटर की पानी की मुख्य लाइन और 48 किलोमीटर की पाइप लाइनें डाली गईं. मेहमानों के खानपान के लिए दुधारू पशुओं, सब्जी और मांस का इंतज़ाम किया गया. दिल्ली दरबार का आयोजन एक जनवरी, 1912 को होना था, पर इस दिन मुहर्रम होने की वजह इसे कुछ दिन पहले करने का फैसला किया गया.
1877 में लॉर्ड लिटन ने महारानी विक्टोरिया की कैसरे हिंद के रूप में उद्घोषणा के अवसर पर पहले दिल्ली दरबार का आयोजन किया गया था. महारानी विक्टोरिया के उत्तराधिकारी के रूप में एडवर्ड सप्तम के राज्यारोहण के अवसर पर 1903 में लॉर्ड कर्जन के समय दूसरे दिल्ली दरबार का आयोजन किया गया. यह दरबार 29 दिसंबर से अगले साल दस दिनों तक चला था. इसके एक भाग का आयोजन लालकिले के दीवान-ए-आम में किया गया था. दूसरे दिल्ली दरबार पर खर्च हुए 1,80,000 पाउंड की तुलना में तीसरे दिल्ली दरबार पर 6,60,000 पाउंड की राशि ख़र्च हुई. किनेमाकलर ने तीसरे दिल्ली दरबार की फिल्म-विद अवर किंग एंड क्वीन थ्रू इंडिया (1912 में सबसे पहली बार प्रदर्शित) बनाई. यह फिल्म से अधिक एक मल्टी मीडिया शो थी. किंग जॉर्ज पंचम और क्वीन मेरी ने किंग्सवे कैंप में आयोजित दिल्ली दरबार में 15 दिसंबर, 1911 को नई दिल्ली शहर की नींव के पत्थर रखे. बाद में इन पत्थरों को नॉर्थ और साउथ ब्लॉक के पास स्थानांतरित कर दिया गया और 31 जुलाई, 1915 को अलग-अलग कक्षों में रख दिया गया. स्थापना दिवस समारोह में लॉर्ड हार्डिंग ने कहा कि दिल्ली के इर्द-गिर्द अनेक राजधानियों का उद्घाटन हुआ है, पर किसी से भी भविष्य में अधिक स्थायित्व अथवा अधिक ख़ुशहाली की संभावना नहीं दिखती. रॉबर्ट ग्रांट इर्विंगंस की पुस्तक-इंडियन समर में हार्डिंग कहते हैं, हमें मुगल सम्राटों के उत्तराधिकारी के रूप में सत्ता के प्राचीन केंद्र में अपने नए शहर को बसाना चाहिए. वायसराय ने बतौर राजधानी दिल्ली के चयन का ख़ुलासा करते हुए कहा कि यह परिवर्तन भारत की जनता की सोच को प्रभावित करेगा. तत्कालीन भारत सरकार के गृह सदस्य सर जॉन जेनकिंस ने कहा कि यह एक साहसिक राजनयिक क़दम होगा, जिससे चहुंओर संतुष्टि के साथ भारत के इतिहास में एक नए अध्याय की शुरुआत होगी. अंग्रेजों की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने के दो प्रमुख कारण थे. पहला, बंगाली अंग्रेजों के लिए काफी समस्याएं पैदा कर रहे थे और अंग्रेजों की नज़र में कलकत्ता राजनीतिक आतंकवाद का केंद्र बन चुका था. वहां लोग रायटर्स बिल्डिंग पर बम फेंक रहे थे, जबकि दिल्ली में ऐसे हालात नहीं थे. लॉर्ड कर्जन के शासनकाल के बाद अंग्रेज बंगालियों को उपद्रवकारी और राजनीतिक रूप से सजग मानने लगे थे. दूसरा, यह एक तरह से मुसलमानों को ख़ुश करने का भी फैसला था. अंग्रेजों की सोच यह थी कि वे एक ही समय में हिंदू और मुसलमानों को नाराज़ नहीं कर सकते. इस सिलसिले में 1911 में आयोजित दिल्ली दरबार की ऐतिहासिक घटनाओं के ब्योरे वाला अहमद अली का उपन्यास दिल्ली में आहत मुस्लिम सभ्यता की पड़ताल करता है. इस किताब के ज़रिए लेखक ने तत्कालीन भारत में अंग्रेजी साम्राज्यवाद की कहानी बयान करते हुए उपनिवेशवादी ताक़त से टक्कर पर मुस्लिम नज़रिए को सामने रखते हुए साम्राज्यवादी साहित्य को चुनौती दी है.
नीरद सी चौधरी ने आजादी मिलने के तुरंत बाद प्रकाशित अपनी आत्मकथा-द ऑटोबायोग्राफी ऑफ अननोन इंडियन में उनकी (बंगालियों) प्रतिक्रिया का स्मरण करते हुए लिखा कि 1911 में मौत का साया, जिससे हम सब अपरिचित थे, पहले ही कलकत्ता पर पसर चुका था. मुझे अभी भी अपने पिता द्वारा उनके मित्रों के साथ राजधानी के दिल्ली स्थानांतरण का समाचार पढ़ने की बात याद है. कलकत्ता का स्टेट्‌समैन गुस्से में था, पर वह भविष्य के बजाय इतिहास के बारे में ज़्यादा सोच रहा था और वह कासनड्रा की तरह भविष्यवाणियां करने का इच्छुक नहीं था. हम बंगाली कासनड्रा की तरह भविष्यवक्ता नहीं थे. हम बातूनी थे. मेरे पिता के एक दोस्त ने रूखेपन से कहा कि वे साम्राज्यों के क़ब्रिस्तान दिल्ली में द़फन होने जा रहे हैं. इस बात पर वहां मौजूद हर कोई हंस पड़ा. हम सभी की तीव्र इच्छा का लक्ष्य अंग्रेजी साम्राज्य का द़फन होना ही था, पर उस दिन हम में से किसी ने भी नहीं सोचा था कि ऐसा होने में केवल छत्तीस साल लगेंगे. अंग्रेज सत्रह सौ सत्तावन से कलकत्ते में राज करते रहे. दिल्ली राजधानी बनाने के छत्तीस साल बाद उनके विश्वव्यापी साम्राज्य का सूरज डूब गया. 1912 में एडविन लैंडसिर लुटियन और उनके पुराने दोस्त हरबर्ट बेकर को बतौर वास्तुकार नए शहर को बसाने की ज़िम्मेदारी दी गई. लुटियन के चुनाव में उनके काम के अनुभव का कम और रिश्ते का जोर ज़्यादा था. सरकारी इमारतें और शहर के वास्तु से उनका दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं था. महत्वपूर्ण बात यह थी कि उन्होंने लॉर्ड लिटन, जिन्होंने 1877 में महारानी विक्टोरिया के समय दिल्ली दरबार की अध्यक्षता की थी, की एकलौती बेटी एमली लिटन से शादी की थी. लुटियन का खास मित्र और सहयोगी गर्टरूड जेकल, जो अच्छा बाग वास्तुशास्त्री भी था, भी एक अच्छे संपर्कों वाला व्यक्ति था. लॉर्ड हॉर्डिंग भी मार्च 1912 के अंत में अपने लाव-लश्कर के साथ दिल्ली पहुंच गए. 1911 में दिल्ली राजधानी स्थानांतरित होने पर दिल्ली विश्वविद्यालय का पुराना वायस रीगल लॉज वायसराय का निवास बना. प्रथम विश्व युद्ध से लेकर क़रीब एक दशक तक वायसराय इस स्थान पर रहे, जब तक रायसीना पहाड़ी पर लुटियन निर्मित उनका नया आवास नहीं बना.
मौजूदा नई दिल्ली शहर दिल्ली का आठवां शहर है. नई दिल्ली के लिए अनेक स्थानों के बारे में सोचा और अस्वीकृत किया गया. दरबार क्षेत्र को अस्वास्थ्यकर और अनिच्छुक घोषित कर दिया गया, जहां बाढ़ का भी ख़तरा था. सब्जी मंडी का इलाक़ा बेहतर था, पर फैक्ट्री क्षेत्र में अधिग्रहण से मिल मालिक नाराज़ हो जाते. सिविल लाइंस में यूरोपीय आबादी को हटाने से उसकी नाराज़गी का ख़तरा था. अत: लुटियन के नेतृत्व में मौजूदा पुराने शहर शाहजहांनाबाद के दक्षिण में नई दिल्ली के निर्माण का कार्य 1913 में शुरू हुआ, जब नई दिल्ली योजना समिति का गठन किया गया. उसने पुराने शहर का तिरस्कार किया और आसपास का इलाक़ा तत्काल ही एक दूसरे दर्जे का शहर यानी पुरानी दिल्ली बन गया. लुटियन के ज़िम्मे नई दिल्ली शहर, गर्वमेंट हाउस और हरबर्ट बेकर के सचिवालय के दो हिस्सों (नॉर्थ एवं साउथ ब्लॉक) और काउंसिल हाउस (संसद भवन) को तैयार करने का भार आया. क़रीब 2,800 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली लुटियन दिल्ली का मूल स्वरूप 1911 से 1931 के मध्य में बना, जो साम्राज्यवादी भव्यता का एक खुला उदाहरण था. इसका मुख्य केंद्र ब्रिटिश साम्राज्य के प्रतिनिधि वायसराय का महलनुमा परिसर (अब राष्ट्रपति भवन) था. अंग्रेज वास्तुकार नई दिल्ली को पुरानी दिल्ली की अराजकता के विपरीत क़ानून-व्यवस्था का प्रतीक बनाना चाहते थे. हरबर्ट बेकर का मानना था कि नई राजधानी अच्छी सरकार और एकता का स्थापत्यकारी स्मारक होनी चाहिए, क्योंकि भारत को इतिहास में पहली बार अंगे्रज शासन के तहत एकता मिली है. भारत में अंगे्रजी शासन केवल सरकार और संस्कृति का प्रतीक नहीं है, यह एक विकसित होती नई सभ्यता है, जिसमें पूर्व और पश्चिम के बेहतर तत्वों का समावेश है. वायसराय पैलेस का मुख्य गुंबद मुगल स्थापत्य कला की तर्ज पर बनाया गया, पर अंग्रेजों ने अपना महत्व बरक़रार रखने के लिए पैलेस की ऊंचाई शाहजहां की जामा मस्जिद से अधिक रखी.
एक तरह से नई दिल्ली का अर्थ भारतीय उपमहाद्वीप के लिए एक साम्राज्यवादी राजधानी और एक सदी के लिए अंग्रेज हुक्मरानों के सपनों का साकार होना था, हालांकि इसके पूरा होने में 20 साल का व़क्त लगा. यह भी तब, जबकि राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने के साथ ही नई दिल्ली बनाने का फैसला लिया गया. इस तरह नई राजधानी केवल 16 साल के लिए अपनी भूमिका निभा सकी. नई दिल्ली में निर्माण कार्य 1931 में पूरा हुआ, जब सरकार इस नए शहर में स्थानांतरित हो गई. 13 फरवरी, 1931 को तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन ने नई दिल्ली का औपचारिक उद्घाटन किया. प्रसिद्ध लेखक खुशवंत सिंह के पिता सर शोभा सिंह ने लुटियन और बेकर के साम्राज्यवादी नक्शे के अनुरूप चूना, पत्थर और संगमरमर तराशने का काम किया. खुशवंत सिंह ने अपनी आत्मकथा सच, प्यार और थोड़ी सी शरारत में नई दिल्ली पर खासी रोशनी डाली है. उनके शब्दों में, मेरे पिताजी को साउथ ब्लॉक बनाने का ठेका मिला था और उनके सबसे जिगरी दोस्त बसाखा सिंह को नार्थ ब्लॉक बनाने का. हमारे मकान के सामने और दक्षिण दिल्ली से कोई बारह किलोमीटर दूर बदरपुर गांव से दिल्ली के लिए, जिसे आज कनाट सर्कस कहते हैं, छोटी रेलवे लाइन गई थी. बदरपुर से निर्माण स्थल तक पत्थर, रोड़ी और बजरी लाने के लिए यह लाइन बिछाई गई थी. जिस दिन छुट्टी होती, हम छोटी सी इंपीरियल दिल्ली रेल के आने का इंतज़ार करते कि कब वह आकर पत्थर उतारे और हम उसमें सवार होकर मुफ्त में कनाट प्लेस की सैर करके आएं.
दिल्ली दरबार रेलवे
दिल्ली दरबार के मद्देनज़र अंग्रेजों ने अतिरिक्त रेल सुविधाएं बढ़ाने और नई लाइनें बिछाने का फैसला किया. सरकार ने इसके लिए दिल्ली दरबार रेलवे नामक विशेष संगठन का गठन किया. मार्च से अप्रैल, 1911 के बीच यातायात समस्याओं के निदान के लिए छह बैठकें हुईं, जिनमें दिल्ली में विभिन्न दिशाओं से आने वाली रेलगाड़ियों के लिए 11 प्लेटफार्मों वाला एक मुख्य रेलवे स्टेशन, आज़ादपुर जंक्शन तक दिल्ली दरबार क्षेत्र में दो अतिरिक्त डबल रेल लाइनों, बंबई से दिल्ली बारास्ता आगरा एक नई लाइन बिछाने जैसे महत्वपूर्ण फैसले किए गए. सैनिक और नागरिक रसद पहुंचाने के लिए कलकत्ता से दिल्ली तक प्रतिदिन एक मालगाड़ी चलाई गई, जो हावड़ा से चलकर दिल्ली के किंग्सवे स्टेशन पहुंचती थी. इस तरह मालगाड़ी क़रीब 42 घंटे में 900 मील की दूरी तय करती थी. नवंबर, 1911 में मोटर स्पेशल नामक पांच विशेष रेलगाड़ियां हावड़ा और दिल्ली के बीच चलाई गईं. देश भर से 80,000 सैनिकों को दिल्ली लाने के लिए विशेष रेलगाड़ियां चलाई गईं.
इतिहास और अगर-मगर
अगर प्रथम विश्व युद्ध न छिड़ा होता तो नई दिल्ली के निर्माण में अधिक धन ख़र्च किया जाता और यह शहर अधिक भव्य बनता. यमुना नदी पुराने किले के साथ बहतीं और राजपथ से गुजरने वाले इसके गवाह बनते. अगर लॉर्ड कर्जन और उनके मित्रों की चलती तो नई दिल्ली को राजधानी बनाने का फैसला रद्द हो जाता. अगर हरबर्ट बेकर ने प्रिटोरिया का निर्माण न किया होता तो लुटियन को नई दिल्ली परियोजना में अवसर न मिलता और न विजय चौक (इंडिया प्लेस) प्रिटोरिया की तर्ज पर तैयार होता. अगर लुटियन की मर्जी चली होती तो राष्ट्रपति भवन (गर्वमेंट हॉउस) सरदार पटेल मार्ग पर मालचा पैलेस के नज़दीक रिज में बना होता. लॉर्ड हार्डिंग के इस प्रस्ताव को ख़ारिज करने के बाद ही रायसीना पहाड़ी पर वायसराय हाउस बना |

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

वीरेंद्र सहवाग और नौ का अजीब आंकड़ा
मुल्तान के सुल्तान वीरेंद्र सहवाग ने गुरुवार को  इंदौर में वो कारनामा कर दिखाया, जिसका सपना विश्व का हर क्रिकेट खिलाड़ी देखता है। एक दिवसीय मैच में 200 रनों का आंकड़ा पार करने वाले सहवाग दुनिया के पहले खिलाड़ी बन गए । इससे पहले क्रिकेट के भगवान माने जाने वाले  सचिन तेन्दुल्कर ने दो सौ रनों   का आंकड़ा बना कर छोड़ रखा था।मास्टर बलास्टर  सचिन ने 24 फरवरी, 2010 उसी मध्य प्रदेश के ग्वालियर में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ नाबाद 200 रन बनाए थे। इसके लिए उन्होंने सिर्फ 147 गेंदों का सामना किया था और 25 चौके तथा 3 छक्के लगाए थे। सहवाग ने अपनी दोहरे शतकीय पारी में 25 चौके और 7 छक्के लगाए। वहीं सहवाग ने 149 गेंदों में 25 चौके और 7 छक्कों की मद्द से 219 रन बना कर विश्व क्रिक्रेट में इतिहास रचाते हुए एक नया अध्याय रच दिया |।  इसके साथ ही नजफगढ़ का यह  नवाब वीरेन्द्र सहवाग एकदिवसीय इतिहास में दोहरा शतक बनाने वाले क्रिकेट के भगवान सचिन से आगे निकल गए है।मजे क़ी बात यह है कि "मुल्तान के सुल्तान" और "नजफगढ़ के नवाब" के नाम से मशहूर विस्फोटक सलामी बल्लेबाज वीरेंद्र सहवाग के साथ "नौ" का अजीबोगरीब खेल है। उनसे जु़डे सभी प्रमुख आंक़डों में "नौ" मौजूद है। अंक ज्योतिष में विश्वास नहीं करने वाले भले ही इसका अलग-अलग गणितीय आकलन करें लेकिन आंक़डे तो कम से कम यही बयां करते हैं। सहवाग ने गुरूवार को इंदौर के होल्कर स्टेडियम में वेस्टइंडीज के खिलाफ खेले गए एकदिवसीय मैच में 219 रन बनाकर इतिहास रच डाला। अपनी इस पारी के दौरान उन्होंने 149 गेंदों का सामना किया। मैच के दिन सहवाग 33 साल और 49 दिन के थे। बतौर गेंदबाज सहवाग ने एकदिवसीय मैचों में 92 विकेट ले चुके हैं। वर्ष 1999 में मोहाली में पाकिस्तान के खिलाफ एकदिवसीय करियर की शुरूआत करने वाले सहवाग ने टेस्ट मैचों में दो बार तिहरा शतक लगाया है। इनमें से एक 319 रनों की पारी थी तो दूसरी 309 रनों की। टेस्ट मैचों में उनका तीसरा सर्वोच्चा स्कोर 293 रनों का है। सहवाग ने अपने करियर का पहला शतक न्यूजीलैंड के खिलाफ 69 गेंदों पर ज़ाडा था। वर्ष 2009 में उन्होंने 60 गेदों पर शतक जडा था, यह किसी भी भारतीय बल्लेबाज द्वारा एकदिवसीय मैच में सबसे तेजी से बनाया गया शतक है। वर्ष 2009 में ही सहवाग को "विजडन लीडिंग क्रिकेटर इन वल्र्ड" का ताज मिला। यह सम्मान पाने वाले सहवाग भारत के एक मात्र खिल़ाडी हैं। सहवाग ने अब तक 92 टेस्ट मैच खेले हैं और उन्होंने 159 पारियों में 7,980 रन बनाते हुए 39 विकेट भी हासिल किए हैं। टेस्ट मैच में सहवाग क्रमश: 90, 99, 96 के तीन मौकों पर 90 और 100 रन के बीच आउट हुए हैं। वहीं, टेस्ट और एक दिवसीय मैचों में एक-एक बार वह 99 के फेर में भी फंसे हैं। दक्षिण अफ्रीका में खेले गए अंडर-19 टूर्नामेंट ने सहवाग को पहली बार देश में एक पहचान दी। घरेलू क्रिकेट में सहवाग नॉर्थ जोन व दिल्ली के लिए खेलते हैं। सबसे मजेदार बात यह है कि वर्ष 1990 में क्रिकेट खेलने के दौरान सहवाग का दांत टूट गया था और इससे उनके पिता इतने घबरा गए थे कि उन्होंने सहवाग को क्रिकेट खेलने से मना कर दिया। शुक्र हो, सहवाग की मां का जिन्होंने सहवाग का खेलना जारी रखा।  यहाँ यह बताना समायोचित होगा कि  सहवाग व सचिन तेंदुलकर से पहले चेन्नई में 21 मई 1997 को भारत के साथ खेलते हुए पाकिस्तान के सय्यद अनवर ने 22 चौकों व 5 छक्कों क़ी मदद से 146 बालों पर 194 रन बनाये थे | जबकि 31 मई 1984 में इंग्लेंड के खिलाफ खेलते हुए वेस्ट इंडीज के वीवेन रिचर्ड्स ने 170 बालों पर 21 चौकों व 5 छक्कों क़ी मदद से 189 रन जड़े थे | वहीँ जिम्बाब्वे के चार्ल्स कोवेंटरी ने 16 अगस्त 2009 को बंगलादेश के खिलाफ खेलते हुए 16 चौकों व 7 छक्कों क़ी मदद से 194 रन बना कर एक इतिहास रचा था |
प्रदीप श्रीवास्तव

'इंग्लैंड-आयरलैंड' और 'अंटाकर्टिका एक अनोखा महादेश'

किताबें-2 श्रीमती माला वर्मा की दो किताबें हाल ही में मिलीं, 'इंग्लैंड-आयरलैंड' और 'अंटाकर्टिका एक अनोखा महादेश' ,दोनों ह...