सोमवार, 15 अगस्त 2016

झाड़ू और हम
सच में अब झाड़ू का महत्व समझ में आया है . वह भी पांच दशक के बाद.अब आप कहेंगे कि वह भी इतने दिनों बाद, कैसे समझ में आया ? आज दोपहर मे छोटे परदे पर बच्चों के साथ एक फिलिम देख रहा था ,तभी एक झाड़ू बनाने वाली कंपनी का विज्ञापन देखा, किस तरह महिलाएं झाड़ू के गुणों का बखान कर खरीदने का आह्वान कर रही थी .विज्ञापन को देखने के बाद प्रधान मंत्री जी का मन ही मन आभार व्यक्त करने लगा , अगर वह झाड़ू अपने हाथ में न लेते, तो इस घर सफाई के प्राचीन यंत्र पर लोगों की कृपादृष्टि नहीं पड़ती, लोग एक वर्ग विशेष तक का ही वर्चस्व उस पर समझते.
आप कह रहें होंगे यह भी कोई बात हुई, सही भी है. याद कीजिये केवल दो दशक पहले वाले लोगों से ही पूछिए ,जब उनके घर वाले उनसे कहते की जाओ बाज़ार से झाड़ू लेते आओ ,या घर आते समय लेते आना,तो उन जनाब (हम -आप सभी ) को कितना बुरा लगता था. हूँ में झाड़ू लेकर आऊंगा ,लोग क्या कहेंगे. आज मुझे याद आ रहा है,जब हम छोटे थे तो अम्मा अक्सर कहती थी की जाओ फलां की दुकान से झाड़ू लेते आओ, तो हम कितना बहाना बनाते कि मुझे न लाना पड़े ,कोशिश होती की छोटा भाई ले आये, लेकिन वह भी हमसे दो हाथ आगे ...,कह देता की हम कैसे लायेंगे इतना बड़ा झाड़ू .कुल ले दे कर झाड़ू लाने का जिम्मा मेरे ऊपर ही पड़ता. घर में बीच (मझौला) का होने के कारण लाना ही मुझे पड़ता.जब सूर्य देवता पश्चिम की ओर विदा लेते ,तब हम झाड़ू लेने का मन बनाते. अकेले ही बाज़ार निकल पड़ते, दोस्तों तक को साथ नहीं लेते ,किराना की दुकान से झाड़ू लेने. के मोलभाव का कोई सवाल नहीं ,जितने में दिया ले लिया ,अम्मा पहले ही बता देतीं थी कि इतने में मिलेगा. लीजिये साहब अब हम झाड़ू लिए और दोनों हाथों से पकड कर पीछे पीठ से लगाकर घर की ओर चल देते ,कोशिश करते कि मोहल्ले का कोई देख न ले कि में झाड़ू लेकर जा रहा हूँ .खुदा न खस्ता बाज़ार से घर के रस्ते में कोई न कोई जरुर मिल जाता ,पहले तो वह मुझे देखता ,फिर मेरे आगे पीछे देखता .हाथ में झाड़ू देखते ही बोल जरुर देता ,का मियां हाथ में का लिए हो ? झाड़ू ,वह कहाँ सफाई करने जा रहे हो .बस इतना सुनते ही गुस्सा फूट पड़ता,कमजोर हुआ तो एकाद -दो खा जाता , अगर वह सवासेर निकला तो अपनी ख़ैर नहीं. मानो पानीपत के युद्ध से लौटा हूँ.
ख़ैर जनाब ,आज के समय में झाड़ू का महत्व कही बढ़ गया है ,लोगबाग अपने हाथों में झाड़ू लिए फोटो खिचवा रहें ,यही नहीं झाड़ू के साथ सेल्फी भी लेने से हिचकिचाते नहीं. यह प्रधानमंत्री की दूरदृष्टि का ही तो नतीजा है कि झाड़ू अब हेय की चीज नहीं शान की चीज हो गई है , तभी तो झाड़ू बनाने वाली कम्पनियां अपना ब्रांड बना कर बेच रही हैं .कहाँ पहले दो-तीन रुपल्ली में मिलने वाला झाड़ू आज सौ से डेढ़ सौ रूपये मिल रहा है .

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