शनिवार, 25 जून 2011



मित्रों ,काफी दिनों बाद आप से यहाँ पर मुखातिब हो रहा हूँ,माफ़ करना | पत्रकारिता क़ी दुनिया में खबरों के बीच समय काम मिल पाता है,फिर भी प्रयास करूँगा कि सप्ताह में न सही पखवाड़े में तो आप से यहाँ पर मिल सकूँ|
हर की पौड़ी पर फोटो खींचता एक व्यवसायिक फोटोग्राफर  
-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
 हरिद्वार,हर क़ी पैड़ी और जग भौजी का स्नान 

बीते माह (मई )  मैं अपने परिवार के साथ हरिद्वार घूमने गया, गया तो पहले भी था,लगभग चालीस साल पहले
 सन 1972 में  | तब मैं गया था अपने बाबू (पिताजी ),अम्मा (माताजी) एवम छोटे भाई बहन के साथ |इस बार 
गया था अपनी पत्नी,व दोनों बेटियों के साथ| तब मैं अपनी अम्मा क़ी अंगुली पकड़ कर गंगा घाट पर टहल
 रहा था, इस बार मेरी बेटी मेरी अगुली पकड़ कर घूम रही थी |  पिछले चालीस सालों में काफी कुछ बदल गया है वहाँ पर ,कितना गंगा जल बह गया ,लेकीन नही बदली हमारी मानसिकता ,बदलते परिवेश के साथ हम ने जरुर अपने को बदलने का प्रयास किया है,वह भी पश्चिमी सभ्यता को अपनाने  के प्रयास में |सन 1972 मे जिस दिन "हर क़ी पौड़ी " पर फिल्म "रामपुर का लक्षमण "के एक गाने क़ी शूटिंग हो रही थी ,जिसमे नायिका दो कपड़ों में थी| शूटिंग के दौरान काफी सुरक्षा व्यवस्था थी| लेकिन इस बार जो कुछ मुझे वहाँ पर देखने को मिला ,उस पर अभी -अभी भी अपनी आखों पर विश्वास नहीं होरहा है.घटना कुछ इस प्रकार है\दिनांक १३ मई  ,दिन शुक्रवार ,सुबह लगभग ग्यारह बजे होंगे, में और मेरे  साढू का परिवार हर कि पौड़ी पर स्नान कर   बाहर ही निकले थे कि तभी तीन महिलाये जिनकी उम्र होगी लगभग चालीस,पैतीस एवं बीस साल क़ी |शायद तीनों अकेले ही आयी थी क्यों  कि उनके साथ कोई पुरुष नहीं दिखाई दिया| तीनों वहीँ घाट पर बैठ कर नहाने लगीं,सभी राजस्थानी लिबास में ही थी , मतलब घाघरा -चोली में| उनमें  जो सबसे उम्र दराज क़ी महिला थी ,उन्हें शायद  कपड़ों में नहाने में कुछ असुविधा महसूस हो रही थी| उस समय केवल मेरी ही नहीं अपितु गंगा घाट पर खड़े सभी लोगों क़ी निगाहें उन्हीं तीनो महिलाओं पर ही थीं ?सभी अपनी नजर (अपने परिवार वालों से )चुराकर उन्हें ही देख रहे थे| इसी बीच उनमे जो उम्र दराज  महिला थी  ,वह पानी से बाहर निकली और इधर उधर देखा,फिर पानी में गई,और घाट क़ी सीढ़ी पर बैठने के बाद अपने दोनों पावं से घाघरा घुटने तक उठाया ,पांवो गंगा के ठन्डे पानी में डाल दिया | कुछ  ही पाल बाद देखा कि उसने दन से अपनी चोली निकाल कर अपने सीने को दोनों पांवो  के बीच दबा कर स्नान करने लगी | न शर्म ,न हया , जरा सा भी उनमे नहीं दिखा | उस द्रश्य को देख कर अपने देश में  एक शराब बनाने वाली कम्पनी के वार्षिक कलेंडर क़ी याद आ गई| आप आश्चर्य करेंगे कि उस महिला ने खुले आकाश के नीचे,सभी के बीच खुल कर नहाई |अभी अपने बदन को पीछे करती तो कभी आगे करती,निःसंकोच उसने गंगा स्नान का भर पूर आनंद उठाया | यही नहीं घाट पर खड़े स्नान करने आये लोगों ने भर पूर नैन सुख भी मजे से लिये  |इस तरह का फूहड़ दृश्य मुझे तो क्या किसी को शायद ही कभी देखने को मिला होगा |कहते हैं क़ी अश्लीलता देखनी हो तो गोवा जाओ ,लेकिन जहाँ तक में समझता हूँ कि वहाँ भी शायद ही ऐसा दृश्य देखने  को मिले? उस दृश्य को देख कर राज कपूर साहब क़ी फिल्म "राम तेरी गंगा मेली "का एक दृश्य याद आ रहा है जिसमे नायिका झरने पर एक मात्र सफ़ेद साडी पहने नहाती है |मुझे अच्छी तरह याद है कि उस दृश्य को लेकर उन दिनों काफी बवाल भी मचा था,लेकिन उसी द्रश्य को देखने के लिये दर्शक सिनेमा घरों पर टूट पड़ते थे |
में ने यहाँ पर शीर्षक में "जग भौजी " का जिक्र किया है|वह इस लिये कि बचपन में लोगों से सुना करता था कि गाँव महल्ले में कुछ ऐसी महिलाऐं होती थी ,जो सभी क़ी भौजाईकहलाती थीं ,जिनके साथ लोग हंसी -मजाक भी किया करते थे,लेकिन वह भौजी उसे बुरा नहीं मानती थी|मौका पाते लोग-बाग उन्हें छेड़ भी दिया करते थे ,अभी भी हैं | कुल मिला कर इतना कहूँगा कि गत चालीस वर्षों में काफी कुछ बदला है ,नहीं बदली है तो हमारी मानसिकता ,क्यों कि आज भी हम पश्चमी सभ्यता को अपनाने के पीछे अपनी संस्कृति व सभ्यता को भूलते जा रहे हैं जिसे संरक्षित करने क़ी पहल हमें ही करनी होगी  |
                                                                                                                           प्रदीप श्रीवास्तव

बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

                               चित्रगुप्त वंदना 

चित्र-चित्र में गुप्त जो, उसको विनत प्रणाम।
वह कण-कण में रम रहा, तृण-तृण उसका धाम ।

विधि-हरी-हर उसने रचे, देकर शक्ति अनंत।
वह अनादि-ओंकार है, ध्याते उसको संत।

कल-कल,छन-छन में वही, बसता अनहद नाद।
कोई न उसके पूर्व है, कोई न उसके बाद।

वही रमा गुंजार में, वही थाप, वह नाद।
निराकार साकार वह, उससे सृष्टि निहाल।

'सलिल' साधना का वही, सिर्फ़ सहारा एक।
उस पर ही करता कृपा, काम करे जो नेक।
-आचार्य संजीव शर्मा सलिल 
--------------------------------------------------------------------------------
गोत्र' तथा 'अल्ल'
'गोत्र' तथा 'अल्ल' के अर्थ तथा महत्व संबंधी प्रश्न राष्ट्रीय कायस्थ महापरिषद् का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष होने के नाते मुझसे भी पूछे जाते हैं.
स्कन्दपुराण में वर्णित श्री चित्रगुप्त प्रसंग के अनुसार उनके बारह पत्रों को बारह ऋषियों के पास विविध विषयों की शिक्षा हेतु भेजा गया था. इन से ही कायस्थों की बारह उपजातियों का श्री गणेश हुआ. ऋषियों के नाम ही उनके शिष्यों के गोत्र हुए. इसी कारण विभिन्न जातियों में एक ही गोत्र मिलता है चूंकि ऋषि के पास विविध जाती के शिष्य अध्ययन करते थे. आज कल जिस तरह मॉडल स्कूल में पढ़े विद्यार्थी 'मोडेलियन' रोबेर्त्सों कोलेज में पढ़े विद्यार्थी 'रोबर्टसोनियन' आदि कहलाते हैं, वैसे ही ऋषियों के शिष्यों के गोत्र गुरु के नाम पर हुए. आश्रमों में शुचिता बनाये रखने के लिए सभी शिष्य आपस में गुरु भाई तथा गुरु बहिनें मानी जाती थीं. शिष्य गुरु के आत्मज (संततिवत) मान्य थे. अतः, उनमें आपस में विवाह वर्जित होना उचित ही था.
एक 'गोत्र' के अंतर्गत कई 'अल्ल' होती हैं. 'अल्ल' कूट शब्द (कोड) या पहचान चिन्ह है जो कुल के किसी प्रतापी पुरुष, मूल स्थान, आजीविका, विशेष योग्यता, मानद उपाधि या अन्य से सम्बंधित होता है. एक 'अल्ल' में विवाह सम्बन्ध सामान्यतया वर्जित मन जाता है किन्तु आजकल अधिकांश लोग अपने 'अल्ल' की जानकारी नहीं रखते. हमारा गोत्र 'कश्यप' है जो अधिकांश कायस्थों का है तथा उनमें आपस में विवाह सम्बन्ध होते हैं. हमारी अगर'' 'उमरे' है. मुझे इस अल्ल का अब तक केवल एक अन्य व्यक्ति मिला है. मेरे फूफा जी की अल्ल 'बैरकपुर के भले' है. उनके पूर्वज बैरकपुर से नागपुर जा बसे.

 साभार :राष्ट्रीय कायस्थ महासभा 
http://kayasthamahaparishad.blogspot.com/2010/02/blog-post_20.html

शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

हिंदी दिवस पर


 आज नहीं तो कल विश्व क्षितिज 
पर चमकेगा "हिंदी का सूर्य " 

सविंधान
का जैसा उल्लंघन भारत में होता है ,दुनिया में कहीं नहीं होता.14 सितम्बर 1949 को सविंधान में हिंदी को राजभाषा बनाया गया और कहा गया कि धीरे-धीरे अंग्रेजी को हटाया जायेगा,लेकिन सविंधान को लागु हुए आज 61 वर्ष हो गए हैं , इन 61 सालों में हुआ क्या?यही न कि अंगरेजी को जमाया जाय.और अंग्रेजी जम गयी.ऐसी जमी कि राष्ट्रपति ,प्रधान मंत्री तक हिंदी में बोलने से कतराते हैं.उन्हें अंग्रेजी का लफ्ज प्रयोग करने में जरा सी भी शर्म नहीं आती है.वे जरा भी नहीं सोचते कि हम आजाद भारत देश के जनप्रतिनिधि हैं.जब वे अंग्रेजी में बोलते  हैं तो  उन्हें देश कि लगभग सौ करोड़ गूंगी -बहरी जनता सुन रही होती है?क्यों कि वे तो केवल पॉँच से सात प्रतिशत जनता के लिये रेडियो व टेलीविजन पर बोल रहे होते हैं.
में यह नहीं  कहता कि अंग्रेजी का विरोध होना चाहिए,
अंग्रेजी का विरोध बेईमानी होगा.क्यों कि किसी भी भाषा व साहित्य का विरोध तो कोई मुर्ख ही करेगा.जो जितनी अधिक भाषा जानेगा,उसके दिमाग कि उतनी अधिक खिड़कियाँ खुलेंगी.उसकी दुनिया उतनी अधिक बड़ी होगी.उसके संपर्कों की,अनुभूतियों क़ी व सूचनाओं का व्यापक क्षेत्र होगा.लेकिन आज अपने देश में कुछ अजीब सा खेल खेला जा रहा है,जिसके चलते स्वभाषाओं के सारे दरवाजे खिड़कियाँ बंदहोते  जा रहे हैं.जो काम सारे दरवाजे व खिड़कियाँ कर सकती हैं ,उसे केवल एक खिड़की से किया जा रहा है,उस खिड़की का नाम है " अंग्रेजी".कहते हैं की अगर आप अंग्रेजी नहीं जानते तो कुछ नहीं जानते.आज मुझे यह कहने में जरा सा भी संकोच नहीं हो रहा है कि राष्ट्र भाषा के साथ जैसा छल-कपट भारत में हो रहा है,वैसा दुनिया के किसी भी देश में किसी  भी भाषा के साथ नहीं होता है. अगर देखे तो आज देश में हिंदी का स्थान "महारानी" जैसा है,लेकिन उससे काम नौकरानी जैसा लेते हैं.आज पूरे देश में "हिंदी दिवस "मनाया जा रहा है,सभी जगह हिंदी कि आरती उतारी जाएगी,लेकिन  तिलक तो अंग्रेजी के माथे पर लगाया जाएगा.सयुंक्त राष्ट्र में हिंदी हमारी नाक है, लेकिन स्वराष्ट्र में हम अंग्रेजी के जूठन को चाटने में जरा सा भी शर्म महसूस नहीं करते.
यह सही है कि अंगरेजी दुनिया के सिर्फ चार-पॉँच देशों क़ी भाषा होते हुए भी आज सौ से अधिक देशों में इस्तमाल कि जाती है.लेकिन हिंदी भी दुनिया के लगभग दर्जन भर देशों में बोली जाती है.आज विश्व में सौ से अधिक देश ऐसे हैं जहाँ पर आप को कुछ न कुछ हिंदी भाषी जरुर मिल जाएँगे . आप मारीशस जाएँ,सूरीनाम जाये या फिर फिजी जाएँ,वहाँ हिंदी का ही अधिपत्य है ,हाँ यह जरुर है कि वहाँ कि हिंदी भाषा में बदलाव आ गया है.वह भी क्षेत्रीय भाषा के चलते .हाल में जर्मन सरकार कि एक रिपोर्ट मीडिया में आयी है,जिसके मुताबिक वहाँ पर हिंदी को लेकर लोंगों में दिलचस्पी बहुत बड़ी है.वहाँ के जर्मन हाईडेलबर्ग ,लोवर सेक्सोनी के लाइपजिंग ,बर्लिन के हम्बोलडिट एवम बान विश्विधालय में हिंदी पड़ने वालों कि संख्या में बहुत इजाफा हुआ है.
अगर हम कहें कि हिंदी आज ग्लोबल भाषा है तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. नाइन -इलेवन कि घटना के बाद अमेरिका ने भी हिंदी भाषा को महत्त्व देना शुरु कर दिया है. कयोंकि उस घटना के बाद सुपर कम्पूटर में सारी दुनिया से आये सभी भाषाओँ के ई.मेलों को खगालना पड़ा .तभी से अमेरिका ने निर्णय लिया कि वह भी अपने देश में स्कूलों में चीनी,रुसी के साथ -साथ हिंदी भाषाओँ के  पठन - पाठन में कि खास व्यवस्था करेगा.आज उस पर वहाँ काफी ध्यान दिया जा रहा है.संचार तकनिकी ने हिंदी के क्षेत्र को और व्यापक बना दिया है.आज दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने में हिंदी के  ई-मेलों का आदान-प्रदान हो रहा है.हिंदी के वेब साईट एवम पोर्टल खुलते  जा रहे हैं अगर कहें कि हिंदी के पीछे संस्कृत का अपर शब्द भंडार है ,करोड़ों लोंगों का वयवहार कोष है,और सैकड़ों वर्षों कि अनवरत अभ्यास है तो कोई नई बात नहीं होगी.कयोंकि आज हिंदी अपने दम-ख़म पर आगे बढ रही है.आज नहीं तो काल हिंदी का सूर्य विश्व के आकाश पर चमकने वाला ही है.
 
                                                                                                                    प्रदीप श्रीवास्तव


बुधवार, 11 अगस्त 2010




          पृथक तेलंगाना राज्य का मामला

              एक बार फिर केंद्र के पाले में
हाल में तेलंगाना के 119 विधान सभा सीटों में से मात्र 12 बारह सीटों के लिये हुए उप चुनाव में ग्यारह सीटों पर तेलंगाना राष्ट्र समिति के उम्मीदवारों ने सफलता हासिल की वहीँ एक मात्र निज़ामाबाद शहर की सीट पर( तेलंगाना राष्ट्र समिति द्वारा समर्थित ) भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार वाई लक्ष्मीनारायण की झोली में फिर से जाने के बाद यह कहा जा सकता है कि इस चुनाव परिणाम से पूरे तेलंगाना क्षेत्र की जनाभिव्यक्ति नहीं है,लेकिन इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता है किबारह सीटों के लिये हुए यह चुनाव केवल विधान सभा की खाली हुई बारह सीटों कों भरने का उपक्रम नहीं ,बल्कि तेलंगाना क्षेत्र में कराया गया एक जनमत संग्रह था.क्यों कि इन बारह सीटों के चुनाव से  तेलंगाना क्षेत्र की सभी 119 सीटों की जनभावनाएं सिमटी हुईं थीं प्रथक तेलंगाना की मांग के सन्दर्भ मे केंद्र सरकार द्वारा गठित श्री कृष्णा समिति के सामने पूरे क्षेत्र का यह सर्वाधिक सशक्त व प्रमाणिक दस्तावेज है.जिसे समिति अपने रिपोर्ट बना सकती है .
वैसे निराने तो केंद्र सरकार व कांग्रेस अध्यक्ष कों ही लेना है.लेकिन चुनाव परिणामों से इतना तो कहा ही जा सकता है कि इस मामले में अब संदेह कि कोई गुंजाईश नहीं रह गई है कि तेलंगाना क्षेत्र की वास्तविक आकांक्षा क्या है.सही मायने में देखा जाय तो 30 जुलाई ,दिन शुक्रवार वर्ष 2010 का दिन भी तेलंगाना के इतिहास में मील का पत्थर साबित हो गया .27 जुलाई कों मतदान तो केवल प चुनाव की औपचारिकता भर थी.इस दिन तो पूरे तेलंगाना क्षेत्र के चार करोड़ निवासियों कि पृथक राज्य कि कामना अट्टहास कर रही थी.क्यों कि प्रथक तेलंगाना एवम सयुंक्त आंध्र ,दोनों नावों पर पेर रखने वालों का सूपड़ा साफ होगया था.सबसे बुरा हाल तो तेलुगु देशम पार्टी के मुखिया नारा चन्द्र बाबू का हुआ ,जिनके प्रताशियों की जमानत तक नहीं बचा  सकी. ये वही बाबू हैं जिन्होंने तेलंगाना एवम आन्ध्र कों अपनी दोनों आखें बता रहे थे ,और ठीक चुनाव के पहले बभाली बांध परियोजना का हंगामा खड़ा कर लोंगों का ध्यान  तेलंगाना से हटा कर बभाली की तरफ बटाना चाहते थे लेकिन चुनाव में वे चौथे स्थान पर रहे. कुल  मतदान का आठवां हिस्सा भी उनकी झोली में नहीं गिरा. जिसे देख कर कहा जा सकता है कि तेलंगाना क्षेत्र में में उनकी पार्टी के लिये अस्तित्व का ही खतरा पैदा होगया है. शायद यही कारण हैकि उनकी पार्टी के कई नेता उनका साथ छोड़कर तेरास का दमन थाम रहे हैं.वहीँ कांग्रेस कों भी कोई सफलता नहीं मिली ,एक भी सीट उन्हें भी नहीं मिली .लेकिन  तेदेपा से उनकी स्थिति बेहतर कही जा सकती है.शायद कांग्रेसी नेताओं कि मज़बूरी थी कि उन्हें पार्टी हाई कमान के आदेश कों मानना मज़बूरी थी, लेकी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डी श्रीनिवास (निज़ामाबाद शहर से कांग्रेस प्रत्याशी) कों जनता ने कतई माफ़ नहीं किया .उन्हें लगातार दूसरी बार हर का सामना करना पड़ा.वे अंतिम chhdon  तक अपनी राजनितिक महत्वकाक्षावों  के लिये अपना स्वर  बदलते रहे.लेकिन जनता ने इस बार भी उन्हें नकार दिया.श्री श्रीनिवास कों लगा था कि इस बार जीतने के बाद वे मुख्य मंत्री न सही काम से काम उप मुख्यमंत्री तो बन ही जायेंगे. सन 2004 के चुनाव में उनहोने तत्कालीन मुख्य मंत्री वाई एस राज शेखर रेड्डी के साथ मील कर काफी मेहनत की थी ,जिसके परिणाम स्वरुप प्रदेश में काफी समय बाद कांग्रेस की सरकार बनी.अभी से डी एस की नज़र मुख्य मंत्री की कुर्सी पर टिकी हुई है.उस समय वाई एस की पदयात्रा की सफलता ने उन्हें मुख्य मंत्री बनवा दिया था ,इसी के चलते उस समय मुख्य मंत्री की कुर्सी उनके हाथ से फिसल गई.फिर आया पूरे पॉँच साल बाद चुनाव का मौका .सन 2009 के चुनाव में डी एस अंतिम चरण में अपने अल्पसंख्यकों के लिये दिए एक बयान "जो आप की तरफ उंगली उठायेगा,उसके हाथ काट दूंगा" से हिन्दू मतदाता उनके खिलाफ हो गए ,फिर क्या सभी ने भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार वाई लक्ष्मी नारायण कों जीता कर विधान सभ में भेज दिया.इसी बीच वाई एस की एक दुर्घटन में मौत हो गई,उस समय भी डी एस कों उम्मीद थी की वे ही मुख्य मंत्री बनेंगे लेकिन विधान सभा के सदस्य न होने के कारण इस बार भी वे चुक गए अपने लक्ष्य से.इसी दौरान पृथक तेलंगाना राज्य की मांग ने जोर पकड़ा ,कई छात्रों व तेलंगाना समर्थकों ने अपनी जन तक दे डाली,जिसके चलते तेलंगाना के कई विधायकोने तेलंगाना की मांग के समर्थ में इस्तीफा दे दिया,जिनमे 12 विधायकों के इस्तीफे मंजूर कर लिये गए,जिनमे निज़ामाबाद शहर विधयक लक्ष्मी नारायण भी शामिल थे.

फिर उप चुनाव की घोषणा हुई,जिसके बाद डी एस कों लगा की इस बार वह जरुर जीत जाएँगे.इस उप चुनाव में उनहोने पैसा पानी की तरह बहाया ,बताते हैं की कम से कम  तीस से चालीस करोड़ खर्च किये.लेकिन वे सफल नहीं हो पाए ,लगातार दूसरी बार हर के चलते उनके राजनैतिक जीवन पर एक प्रश्न लग गया .चुनाव के दौरान वे एक ही रात लगाते रहे की तेलंगन की मांग कों केवल कांग्रेस ही पूरी कर सकती है.इस बीच उन्हों ने यह संकेत भी देने शुरू कर दिए कि चुनाव में जीत के बाद वे मुख्य मंत्री या उप मुख्य मंत्री तो जरुर बनेंगे ,तब तेलंगाना का भाग्य पलट देंगे.लेकिन तेलंगाना कि जनता ने उनके इन वायदों  कों झुठलाते  हुए उन्हें विधान दभा में ही जाने से रोक दिया.मजे कि बात यह हैकि इस चुनाव में उनकी पार्टी के कि भी बड़े नेता ने प्रचार ही नहीं किया,यहाँ तक कि मुख्य मंत्री रोश्य्या ने भी नहीं .यही हाल टी डी पी का रहा .उनके प्रमुख बाबू ने भी प्रचार कि जहमत उठाने कि कोशिस नहीं की,उन्हें लगा की बभाली का मुद्दा उनके लिये राम बाढ़ सिद्ध होगा. लेकी पाशा ही पलट गया ,बभाली मामला उनके गले की हादी बनगया.ते.दे.पे प्रत्याशी ए.नरसा रेड्डी की जमानत ही जब्त हो गई .सभी बारह सीटों पर उनके प्रत्याशी हर गए.उल्लेखनीय है की टी.आर.एस.मुखिया के.चन्द्र शेखर राव अपने चुना अभियान में जुटे रहे उनहन ने बाबू के बभाली अभियान पर जरा सा भी धयान नहीं दिया,साया वह इस बात कों समझ रहे थे की "लक्ष्य ए भटकाव नुकसान पहुंचा सकता है.यह उनका अपना निजी अनुभव भी रहा होगा.इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि यह चुनाव उनके जीवन-मृत्यु का प्रश्न था?अगर एक भी सीट कम आती तो यही कहा जाता कि सम्पूर तेलंगाना पृथक तेलंगाना के पक्ष में नहीं है.यकीन अब किसी कों इस बात में नहीं है कि तेलंगाना की जनता स्वतंत्र राज्य नहीं चाहती.शायद राव साहेब के लिये यह चुनाव एक चुनौती थी जिसे उन्हों ने स्वीकार कर साबित कर दिया की यह चुनाव सत्ता के लिये नहीं था. तभी तो चुनाव की  घोषणा  के बाद उन्हों ने कह दिया कि जरुरत पड़ी तो उनके विधायक फिर अपनी सदस्यता से इस्तीफा दे सकते हैं.श्री राव का यह भी मानना है कि चुनाव जीतने का मतलब यह नहीं है कि वे चार साल तक विधान सभा में बैठ कर बिताएंगें.तभी तो वह कहते हैं कि "हम विधानसभा क़ी फिर से सदयस्ता प्राप्त करने के लिये चुनाव में नहीं उतारे थे,बल्कि पृथक तेलंगाना क़ी जनभावना कों प्रमाणित करने के लिये मुकाबले में उतरे थे.
 इसी लिये उनहोने केंद्र सरकार से मांग क़ी है कि वह इस चुनाव के परिणामों कों जनमत संग्रह कि तरह स्वीकार पृथक राज्य के लिये सीधे लोकसभा में प्रस्ताव पेश करे.इसके साथ ही उनहोने अपने कार्यकर्ताओं कों भी सलाह दी है कि वे बहुत उत्तेजित न हों,क्योंकि इस चुनाव परिणामों ने उनके कंधे पर एक जबरदस्त जिम्मेदारी दल डी है.बात जो भी हो इस चुनाव परिणामों से एक बात तो सिद्ध हो गई है कि तेलंगाना कि जनता अलग राज्य चाहती है ,इस लिये केंद्र सरकार कों तेलंगाना राज्य कि मांग स्वीकार कर लेनी चाहिए.इस उपचुनाव परिणामो से श्री कृष्ण समिति कों भी अब कोई खास मशक्कत करने कि कोई जरुरत नहीं है.समिति चाहे तो 31 दिसंबर के पहले ही अपनी रिपोर्ट सरकार कों सौंप दे.अगर ऐसा नहीं होता है तो तेलंगाना कि जनता एक बार फिर से आन्दोलन के लिय सड़क पर उतर सकती है,किसका परिणाम सन 1968 -69 एवम 2009 के आन्दोलन से कही भयंकर होगा.अब कुल मिला कर इतना तो जरुर कहा जा सकता है कि गेंद अब फिर केंद्र सरकार के पाले में है. परन्तु वह किस तरह खेलती है ,यह देखना होगा.
प्रदीप श्रीवास्तव

शनिवार, 3 जुलाई 2010





उसकी खिड़कियाँ व सामने का भाग भी ठीक हवाई जहाज की भांति है. सामने की ओर पंखा भी लगा है,जो हवा चलने पर तेज गति से चलता है.जिसे बनवाया है पंजाब के संत बाबा नरेंद्र सिंह एवम संत बाबा बलविंदर सिंह जी ने.जिनकी योजना है कि आगे चल कर यात्री निवास के निकट कि जमीन पर विशाल भवन बनवाया जाय और उसकी छत पर हेलीकाप्टर उतर सके . इस रपट कों नादेड से भेजी है पत्रकार रविंदर सिंह मोदी ने.फोटो हैं नरेंदर गढ़ाप्पा   के.

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009


बुरहानपुर के जैनाबाद स्थित आहुखाना,जहाँ पर प्रसव के दोरान मुमताज की मृत्यु हुई थी. 
--------------------------------------------------------------------------------------------------

दो बार दफनाया गया था मुमताज को

 विश्व के सात आश्र्चार्यों में से एक ,प्रेम का प्रतीक ताजमहल और आगरा आज एक दुसरे के पर्याय बन चुके  हैं.अब ताज भारत का गौरव  ही नहीं अपितु दुनिया का गौरव  बन चूका है.ताजमहल दुनिया की उन 165 एतिहासिक इमारतों में से एक है ,जिसे राष्ट्र  संघ ने विश्व धरोवर की संज्ञा से विभूषित किया है.इस तरह हम  कह सकते हैं की ताज हमारे दिहने का एक बेशकीमती दाँत है,जो सैलानियों एवम विदेशी पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है.प्रेम के प्रतीक इस खुबसूरत ताज के गर्भ में मुग़ल सम्राट शाहजहाँ की सुंदर प्रेयशी मुमताज महल की यादे सोयी हुई है.जिसका निर्माण शाहजहाँ ने उसकी यद् में करवाया था.कहते हैं कि इसके बनाने में कुल बाईस वर्ष लगे थे,लेकिन  यह बात बहुत कम लोगों को पता है कि सम्राट शाहजहाँ कि पतनी मुमताज कि न तो आगरा में मोत हुई थी ओर नहीं उसे आगरा में दफनाया गया था.मुमताज महल तो मध्य प्रदेश के एक छोटे जिले बुरहानपुर (पहले खंडवा जिले का एक तहसील था)के जैनाबाद तहसील में मरी थी,जो सूर्य पुत्री ताप्ती नदी के पूर्व में आज भी स्थित है.इतिहासकारों के अनुसार खान जहाँ लोदी ने जब 1631 में विद्रोह का झंडा उठाया था.

तब  शाहजहाँ  अपनी पत्नी (जिसे वह अथाह प्रेम करता था.) मुमताज महल को लेकर लेकर बुरहानपुर चला गया ,उन दिनों मुमताज गर्भवती थी ,पुरे 24 घंटे तक  प्रसव पीड़ा से तड़पते हुवे जीवन-मृत्यु से संघर्ष करती रही . सात जून ,दिन बुधवार सन 1639 कि वह भयानक रात थी,शाहजहाँ अपने कई ईरानी हकीमों एवं वैद्यों के साथ बैठा दीपक कि टिमटिमाती लौ में अपनी पत्नी के चहरे को देखता रहा ,उसी रात मुमताज महल ने एक सुन्दर बच्चे को जन्म दिया ,जो अधिक देर तक जिन्दा नहीं रह सका .थोड़ी देर बाद मुमताज ने भी दम तोड़ दिया.दूसरे दिन गुरुवार कि शाम उसे वहीँ आहुखाना के पाइन बाग में सुपुर्द -ऐ- खाक आर दिया गया .वह ईमारत आज भी उसी जगाह जीर्ण-शीर्ण अवस्था में खड़ा मुमताज के दर्द को बयां करती है.इतिहासकारों के मुताबिक   मुमताज कि मोत  के बाद शाहजहाँ का मन हरम में नहीं रम सका,कुछ दिनों के भीतर ही उसके  बाल रुई जैसे  सफ़ेद हो गए.वह अर्धविक्षिप्त सा हो गया,वह सफ़ेद कपडे पहनने लगा .

एक दिन उसने मुमताज कि कब्र पर पर हाथ रख कर कसम खाई कि मुमताज तेरी यद् में एक ऐसी ईमारत बनवाऊंगा ,जिसके बराबर कि दुनिया में  दूसरी नहीं होगी. बताते हैं कि शाहजहाँ कि इच्छा थी कि ताप्ती नदी के तट पर ही मुमताज कि स्मृति में एक भव्य ईमारत बने ,जिसकी सानी का दुनिया में दूसरी ईमारत न हो. इसके लिए शाहजहाँ ने ईरान से शिल्पकारों को जैनाबाद बुलवाया .ईरानी शिल्पकारों ने ताप्ती  नदी के का निरिक्षण किया तो पाया कि नदी के किनारे कि काली  मिटटी में पकड़ नहीं है,और आस-पास की जमीं भी दलदली है.दूसरी सबसे बड़ी बाधा ये थी कि तप्ति नदी का प्रवाह तेज होने के कारण जबरदस्त भूमि कटाव था,इस लिए वहां पर ईमारत को खड़ा कर पाना संभव नहीं हो सका उन दिनों भारत  कि राजधानी आगरा थी ,इस लिए शाहजहाँ ने आगरा में ही पत्नी कि यद् में ईमारत बनवाने का मन बनाया .उन दिनों यमुना के तट पर बड़े -बड़े रईसों कि हवेलियाँ थी ,जब हवेलियों  के मालिकों को शाहजहाँ कि इच्छा का पता चला तो वे सभी अपनी-अपनी हवेलियाँ बादशाह को देने कि होड़ लगा दी.इतिहास में इस बात का पता चलता है कि सम्राट शाहजहाँ को राजा जय  सिंह कि अजमेर वाली हवेली पसंद आ गई.सम्राट ने हवेली चुनने  के बाद ईरान ,तुर्की,फ़्रांस एवम  इटली से शिल्पकारों को बुलवाया .कहते हैं कि उस समय वेनिस से प्रसिद्ध सुनार एवम जेरोनियो को बुलवाया गया था शिराज से उस्ताद ईसा आफंदी भी आये ,जिन्होंने ताजमहल कि रुपरेखा तैयार कि थी.उसी के अनुरूप कब्र कि जगाह को तय किया गया .22 सालों के बाद जब प्रेम का प्रतीक ताजमहल बन कर तैयार हो गया तो उसमे मुमताज महल के शव को पुनः दफनाने कि प्रक्रिया शुरू हुई .बुरहानपुर  के जैनाबाद से मुमताज महल के जनाजे को एक विशाल जुलूस के साथ आगरा ले जाया गया और ताजमहल के गर्भगृह में दफना  दिया गया. इस विशाल जुलूस पर इतिहासकारों कि टिप्पणी है कि उस विशाल जुलूस पर इतना खर्च हुआ था कि  जो किल्योपेट्रा के उस एतिहासिक  जुलूस कि याद  दिलाता है जब किल्योपेट्रा अपने देश से एक विशाल समूह के साथ सीज़र के पास गयी थी.

जिसके बारे में इतिहासकारों का कहना है कि उस जुलूस पर उस समय आठ करोड़ रुपये खर्च हुवे थे.ताज के निर्माण के दौरान ही शाहजहाँ के बेटे औरंगजेब ने   उन्हें कैद कर के पास के लालकिले में रख दिया . जहाँ से शाहजहाँ एक खिड़की से निर्माणाधीन   ताजमहल  को चोबीस  घंटे  देखते रहते थे. कहते हैं कि जब तक ताजमहल बन कर तैयार होता ,इसी बीच शाहजहाँ कि मौत हो गई.मौत के पहले शाहजहाँ ने इच्छा जाहिर कि थी कि "उसकी मौत के बाद उसे यमुना नदी के दूसरे छोर पर काले पत्थर से बने एक भव्य ईमारत में दफ़न किया जाए, और दोनों इमारतों को एक पुल से जोड़ दिया जाय",लेकिन उसके पुत्र औरंगजेब ने अपने पिता कि इच्छा पूरी   करने के बजाय ,सफ़ेद संगमरमर के उसी भव्य ईमारत में दफना उसी जगाह दफना दिया,जहाँ पर उसकी माँ यानि मुमताजमहल चिर निद्रा में सोईं हुई थी.उसने दोनों प्रेमियों को आस-पास सुला कर एक इतिहास रच दिया.पाठकों बुहरानपुर पहले मध्य प्रदेश के खंडवा जिले कि एक तहसील हुआ  करती थी ,जिसे हाल ही में जिला बना दिया गया है.यह जिला दिल्ली  -मुंबई रेलमार्ग पर इटारसी-भुसावल के बीच स्थित है ,बुहरानपुर रेलवे स्टेशन भी है ,जहाँ पर लगभग सभी प्रमुख रेल गाड़ियाँ रुकती हैं.बुहरानपुर स्टेसन  से लगभग दस किलोमीटर दूर ,सहर के बीच बहाने वाली ताप्ती नदी  के उस पर  जैनाबाद (फारुकी काल),जो कभी बादशाहों कि शिकारगाह (आहुखाना) हुआ करता था, जिसे दक्षिण  का सूबेदार बनाने के बाद शहजादा दानियाल ,जो शिकार का काफी शोकिन था ,ने इस जगाह को अपने पसंद के अनुरूप महल,हौज ,बाग-बगीचे के बीच नहरों का निर्माण करवाया था.लेकिन ८ अप्रेल १६०५ को मात्र तेईस साल कि उम्र मे सूबेदार कि मौत हो गई,स्थानीय लूग बताते हैं कि इसीके बाद अहुखाना उजड़ने लगा.  स्थानीय वरिष्ठ    पत्रकार मनोज यादव कहतें है कि जहाँगीर के शासन काल में सम्राट अकबर के नौ रतनों में से एक अब्दुल रहीम खानखाना  ने ईरान से खिरनी एवम एनी प्रजतिओं के पोधे मंगवा कर अहुखाना को पुनः ईरानी बाग के रूप में विकसित करवाया.इस बाग का  नाम शाहजहाँ  कि पुत्री आलमआरा  के नाम पर पड़ा.बादशाह नामा के लेखक अब्दुल हामिद  लाहोरी  साहब के मुताबिक शाहजहाँ कि प्रेयसी मुमताज महल कि जब प्रसव के दोरान  मोत हो गई तो उसे यहीं पर स्थाई रूप से दफ़न कर दिया गया था,जिसके लिए आहुखाने के एक बड़े होज को बंद कर के तल घर बनाया गया ,और वहीँ पर मुमताज के जनाजे को छः माह रखने के बाद शाहजहाँ का  बेटा शहजादा सुजा,सुन्नी बेगम व् शाह हाकिम वजीर खान ने मुमताज के शव को लेकर बुहरानपुर के इतवारागेट -दिल्ली दरवाज से होते हुवे आगा ले गए. जहाँ पर यमुना के तट पर स्थित राजा मान सिंह के पोते राजा जाय सिंह के बाग में में बने ताजमहल में सम्राट शाहजहाँ कि प्रेयसी एवम पत्नी मुमताजमहल के जनाजे को दुबारा दफना दिया गया.यह वाही जगाह है जहाँ आज प्रेम का शास्वत प्रतीक ,शाहजहाँ -मुमताज के अमर प्रेम के बखानो को बयां करता हुवा नील गगन के नीचे विश्व के सात अजूबों में से पहला अजूबा जिसे  प्रेम की कहें या फिर पति-पत्नी के अटूट बंधन को, प्रदर्शित करता हुआ विश्व प्रसिद्ध "ताजमहल" खड़ा है.
                                                                                                 प्रदीप श्रीवास्तव

                                                                          आगरा  का ताजमहल
                        ----------------------------------------------------------------------------
                                                                                                                                                                                                                                       

रविवार, 1 नवंबर 2009

             कंक्रीट के जंगल में लुप्त होती गौरय्या

पाठको आप में से कई लोगों को याद भी नहीं होगा कि आखिरी बार गौरय्या उन्होंने कब देखा था, नई पीढी के बच्चों ने तो केवल अपनी पाठ्य पुस्तकों में ही पढ़ा होगा ,वह भी गौरय्या नहीं ,अंगरेजी में स्पयरो शब्द से ही जानते होंगें. जानेंगे भी कैसे ,महानगरों कि बात छोडें, अब तो छोटे शहरों के साथ -साथ कस्बों में भी बन रही अपार्टमेंटों के अलावा ध्वनी प्रदूषण के चलते नन्हीं सी खुबसूरत जान घबरा कर गायब हो गईं हैं.कंक्रीटों के जंगल के बीच जरुर शहरों के सोंदर्य में चार-चाँद लग गए हों,लेकिन सच्चाई ये है कि कंकरीट के इस जंगल में पेड़ गायब होते जा रहें है ,या यूँ कहें कि गायब होते पेडो के चलते इन गौरय्या का बसेरा काम हो गया है.महानगरों कि भागम -भाग कि जिंदिगी के बीच वाहनों कि चकाचोंध एवं ध्वनी प्रदुषण के चलते लोगों में इतना समय नहीं है कि वे इन नन्ही जान कि दाना पानी दें सके.

लगभग दो दशक पीछे चलें तो आप को याद आयेगा कि किस तरह यह घरेलु चिडिया गौरय्या कि चहचाहट से घर वालों कि नींद खुलते थी ,दादी हों या नानी वे अपनें हाथों में झाडू लेकर घर के बड़े आँगन को बुहारने लगाती थीं. आंगन साफ होते ही गौरय्या का झुंड चीं-चीं करती आंगन में उतर आतीं. जिन्हें देख कर हम छोटे -छोटे बच्चे किलकारी भरते हुवे उन्हें पकड़ने का प्रयास करते ,लेकिन वे नन्ही जान फुदक कर दूर जा बैठती .याद करें कि तब सुबह का आभास सूर्योदय से पहले इन गौरय्या कि चहचाहट या फिर कोवे के कावं- कावं से होता था.जिनकी आवाज सुनकर लोग अपना बिस्तर छोड़ देते थे. अब उन आवाजों वा चहचाहट कि जगह ले ली है मोबाईल कि टोन ने .आखिर क्यों, क्यों कि उनकी चहचाहट को हम-आप ने छीन ली है. क्यों कि कटते पेड ,बढते प्रदुषण के चलते यह नन्ही जान गौरय्या हमसे रूठ गई है.अब आप कि कहाँ सुने देती है इनकी कलरव.इनका रूठ जाना भी जायज है. हम अपनी आधुनिक जीवन शैली में इतने स्वार्थी हो गएँ हैं कि हमें उनके जीवन कि परवाह ही नहीं रही .
याद करें तब मकानों कि ऊँची-ऊँची दीवारे होती थी,जिन पर रोशनी वा हवा आदि आने के लिए रोशन दन बने होते थे, जिन पर वे तिनका-तिनका जोड़ कर अपना घोंसला बनती,फिर उसमें अंडा देती ,जिसका वे कितना ख्याल रखती. हम छोटे भाई-बहन कभी -कभी उनके घोसलों से अंडे हटा देते .जब वे वापस लोटती तो घोंसले अपने अण्डों को न देख कर कितनी तेज ची-ची करती,जिसे सुनकर माँ ,नानी वा दादी हम लोगों पर कितना गुस्सा करती .जब हम अंडे वापस रख देते , तो वे उन्हें देख कर कितनी खुश होतीं थी ,इस बात का पता आज चलता है,जब हम अपने बच्चों को कुछ समय बड देखते हैं.आज जो घर बन रहे हैं उनमे आदमी के लिए ही जगह नहीं होती ,तो वहाँ पर पक्षी अपना घरोंदा कहाँ बना सकते हैं. जो जगह बनाते भी हैं तो वहाँ पर शीशे या फिर लोहे कि जाली लगवा देते हैं.
कहने का मतलब आज हम अपने घरोंदों के बनवाने के फेर में इन नन्ही जान के घरोंदो को छिनते जा रहे हैं. आखिर वे जाएँ तो जाएँ कहाँ ? कालोनियों में पार्क तो बन रहें हैं ,लेकिन वहाँ पर पेडो कि जगह लोहे के खेलने के उपकरण लग गएँ हैं.शहर ही नहीं गांवो इ हालत बुरी हो चली है,खेतों कीटनाशक डालने से मरे कीट गौरेये के खाने के लायक नहीं रहे पहले घरों के आंगन में बच्चो द्वारा खाना खाते वक्त आधा खाते आधा गिराते थे ,अब वह भी नहीं रहा.बच्चे घर कि चार दिवारी के भीतर डायनिंग टेबल पर खाते हैं.तो फिर जूठन कहाँ निकलेगा,जिसे चिरिया चुग सकेगी .
बात केवल गौरय्या कि ही नहीं है,अब न तो कोवे दिखाई देते हैं न ही गौरेये कि सहेली मैना ही दिखाती है,न ही कोयल कि कूँ- कूँ सुनाई देती है.तोते कि बात ही न करें टी बेहतर होगा .
आखिर यह सब क्यों, इसी लिए न कि हम सब प्रकृति से खुलकर खिलवाड़ जो करने लगें हैं इसका फल भी तो हमें आप को ही भुगतना पड़ेगा .यह समस्या केवल भारत कि ही नहीं बल्कि पुरे विश्व कि है.इसके लिए हमें और आप को ही पहल करनी होगी .तभी हम अपने पशु पक्षियों को बचा सकें गें ,नहीं तो ये सब भी इतिहास के पन्नों में अंकित हो कर रह जायेंगें
                                                                                                                                      प्रदीप श्रीवास्तव

शनिवार, 26 सितंबर 2009

एक खबर,जो खबर न बनी

       
 


   25 सितम्बर 09 कों  नांदेड के लोहा तहसील में जनसभा कों संबोधित   करने जाते   हुवे महाराष्ट्र के सी एम अशोक राव चौहान 

                            ---------------------------------------------------------------------------------------------  
  जब महाराष्ट्र के सी. एम. पर चप्पल फेंकी गई 
अमेरिका के पूर्व  राष्ट्रपति जार्ज बुश,भारत के गृह मंत्री चिदंबरम ,गुजरात के मुख्य मंत्री नरेन्द्र मोदी पर चप्पल फेंका गया था तो यह खबर पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी खबर थी ,लकिन जब महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री अशोक राव चौहान  के ऊपर इसी तरह चप्पल फेंकने कि घटना होती है तो वह बड़ी खबर नहीं बनती, यह बात समझ में नहीं आ रही .घटना २५ सितम्बर के दुपहर कि है,जब महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री अशोक राव चौहान अपने गृह नगर नांदेड के लोहा नगर पालिका क्षेत्र में एक चुनावी जनसभा कों संबोधित करने जा रहे थे कि वहीँ से विधान सभा का चुनाव लड़ रहर प्रताप राव चिखलीकर के समर्थको ने उन पर चप्पल फेंक कर  अपना विरोध प्रकट कहतें हैं कि वहां से चिखलीकर कों राष्ट्रवादी पार्टी से टिकट न दिया जाना. लोहा विधानसभा क्षेत्र  से एन सी पी व कांग्रेस के सयुंक्त प्रत्याशी शंकर अन्ना घोंड़गे कों टिकट दिया गया है.इस मामले में  घोंड़गे व उनके समर्थको का कहना है कि अशोक राव ने ही उनका टिकट कटवाया है.घटन के विषय में बताया जाता है कि जब अशोक राव लोहा शहर में जनसभा कों सबोधित करने जा रहे थे कि उसी समय चिखलीकर अपने समर्थको के साथ तहसील कार्यालय से नामांकन कर लौट रहे थे, तभी मुख्य बाज़ार में दोनों लोगो का काफिला आमने -सामने आ गया ,इसी बीच चिखलीकर जिन्दा बाद के नारे लगते हुवे कुछ असामाजिक तत्वों ने उन पर चप्पल फेंक दिए ,जो अशोक राव कों न लगकर उनके ड्राइवर कों जा लगा .यह देख कर उनके सुरक्षा मैं लगे पुलिस कर्मियों ने तुंरत उन्हें अपने घेरे में लेते हुवे पास के एक घर में ले गए. इस बीच इस्थिति बिगड़ते देख कर पुलिस कों वहां पर लाठी भी भांजनी पड़ी.इन लाइनों के लिखने तक किसी कि गिरफ्तारी  नहीं हुई थी.इस सब के बावजूद  अशोक राव ने वहां पर अपना भासन दिया भी.  घटना के विषय में बताया जाता है कि प्रताप राव पाटिल चिखलीकर विधान सभा के लिए कांग्रेस से टिकट मांग रहे थे ,कांग्रेस व राष्ट्रवादी कांग्रेस के बीच समझौता होने के कारण लोहा विधान सभा से राष्ट्रवादी के शंकर अन्ना घोंडगेको प्रत्याशी बनाया गया है. जिससे पाटिल  नाराज हैं,उनका कहना है कि अशोक राव  ने ही उनका पत्ता कटवाया है.बात जो भी हो कहने का मतलब यह है कि एक मुख्यमंत्री पर इस तरह से हमला हो और उसे मीडिया गंभीरता से न ले,बात कुछ समझ में नहीं आ रही है. यही घटना दिल्ली ,मुंबई,या फिर विदेश के किसी शहर में होती तो उसे कितनी पमुखत दी जाती.के लोकतंत्र में यह सब जायज है.एक मुख्यमंत्री पर इस तरह से हमला होना खबर नहीं बनती क्या? आखिर मिडिया छोटे शहरों में घटने वाली खबरों कों क्यों प्रधानता नहीं देती? जब कि आज हम आधुनिकता के इस युग में नित नए तकनीक का प्रयोग कर रहे हैं.


प्रिये पाठको इसका उत्तर आप पर छोड़ता हूँ कि आप क्या सोचते हैं
 

                                            भीड़ कों तितर-बितर करती महाराष्ट्र की पुलिस
                                --------------------------------------------------------------------------------- 


'इंग्लैंड-आयरलैंड' और 'अंटाकर्टिका एक अनोखा महादेश'

किताबें-2 श्रीमती माला वर्मा की दो किताबें हाल ही में मिलीं, 'इंग्लैंड-आयरलैंड' और 'अंटाकर्टिका एक अनोखा महादेश' ,दोनों ह...